भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 799

हिन्दी निरुक्त ( २७ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० बल्कि-अन्य दो मतों में ही है। अब उन्हीं दो मतों में उसी बातको फिर दूसरे प्रकार से कहते हैं- (निरु०-) अपि च सत्वानां प्रकृतिभूमभिर्ऋषयः स्तुवन्ति-इत्याहुः ॥ और भी, सत्त्वों (नाना द्रव्यों) की जो प्रकृति है, उस के बहुत्वों से ऋषि स्तुति करते हैं ऐसा आचार्य कहते हैं। अर्थात्-आत्मवित् के मत से सब पदार्थों के मूल कारण पर- ब्रह्म महान् आत्मा के बहुत्व को लेकर ऋषि स्तुति करते हैं, जिस किसी वस्तु की भी स्तुति करते हैं, उसे ब्रह्म समझ कर या उसका कार्य समझ कर या उससे अभिन्न समझ कर करते हैं, उन्हें नाना नामों तथा नाना रूपों में वही एक आत्मा प्रतीत होता है। एवम् नैरुक्तमत में तीन आत्मा या तीन प्रकृतिएं हैं, उन के ही अन्य सब पदार्थ विकार हैं, वे एक १ लोक में एक २ देवता में ही वहां के सब पदार्थों को अन्तर्गत समझते हैं, नाना नामों से उन्हीं तीन देवों की स्तुति होती है। इस मत में "प्रकृतीनां भूमभिः प्रकृतिभूमभिः" ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं। (निरु०-) प्रकृतिसार्वनाम्याच्च । और प्रकृति या प्रकृतियों की सर्वनाम्यता से । आत्मवित् के मत में प्रकृति = महान् आत्मा के ही सब नाम हैं, क्योंकि उसी से सब जगद् उत्पन्न हुआ है। अतः सब नामों से उसी की स्तुतिएं हैं। नैरुक्तों के मत में अग्नि इन्द्र और आदित्य इन तीन ही प्रकृतियों के सब नाम हैं, क्योंकि-उन्हीं से सब जगत् उत्पन्न होता है। इस से सब