भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 800

नामों से इन्हीं तीन देवों की स्तुति है । पहिले मत में “प्रकृतेः सार्वनाम्न्यं प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्” प्रकृति का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसार्वनाम्न्य, और दूसरे मत में “प्रकृतीनां सार्वनाम्न्यम्, प्रकृतिसार्वनाम्न्यम्” प्रकृतियों का सार्वनाम्न्य = प्रकृतिसर्वनाम्न्य होता है । मनुष्यों से देवताओं की विलक्षणता— (निरु०-) इतरेतरजन्मानो भवन्ति, इतरेतर- प्रकृतयः । देवता इतरेतरजन्मा होते हैं,-परस्पर से उन का जन्म होता है और इतरेतरप्रकृति होते हैं-आपस में एक का एक कारण हो जाता है । जैसे-अग्नि का कारण सूर्य और सूर्य का कारण अग्नि । इससे देवता मनुष्यों से विपरीत धर्म वाले हैं, उनके अश्व आदि मनुष्यों के अश्व आदि के समान असमर्थ नहीं हैं । देवता ईश्वर होकर भी क्यों जन्म लेते हैं— (निरु०-) कर्मजन्मानः । देवता कर्मजन्मा हैं-कर्म के लिये उनका जन्म है-लोकों के कर्मफल की सिद्धि के लिये इनका जन्म है । क्योंकि-इनके विना लोक का कोई कर्म सफल नहीं हो सकता । किस वस्तु से देवता जन्मते हैं ? (निरु०-) आत्मजन्मानः । देवता आत्मजन्मा हैं-अपने से ही आप उत्पन्न होते हैं,-इन्हें दूसरे पदार्थ की अपने जन्म में अपेक्षा नहीं है ।