भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

८० अ० १ पा० ३ ख० ५ । क्षयार्थक 'दस्' धातुसे होता है। [क्योंकि-उत्तर परिभाषणसे] अधिक क्षीण होता है। [४र्थ पादार्थ-] कोई विद्वान् विज्ञानमें अगाध जलवाले तड़ागके समान देखे जाते हैं। [एक पद निरुक्त] ["स्नात्वा"] 'प्रस्नेय नाम स्नान योग्यका है। 'ह्रद' शब्द शब्दार्थक ह्रद् धातुसे बनता है। [क्योंकि-यह ताड़न किया हुआ शब्दको करता है।] अथवा शीतीभाव या ठंडक अर्थवाले 'ह्लाद्' धातुसे बनता है। [क्योंकि-वह ग्रीष्ममें भी ठंडा ही रहता है।] और 'त्वत्' यह अन्य निपात समुच्चय अर्थमें होता है॥ ४॥ विशेष-'ददृशिरे' यह पद मन्त्रगत "ददृश्रे" की व्याख्या है, निरुक्तमें 'प्रस्नेयाः' पदके आगे किसी समय किसी लेखकके प्रमाद से एक पद निरुक्तमें आगिरा हुआ प्रतीत होता है, यह चतुर्थ पादकी व्याख्यामें 'एके' पदके साम्हने चाहिये। ऐसा होनेसे ही दोनों स्थान ठीक होजाते हैं। (ख० ५) “पर्याया इव त्वदाश्विनम्। आश्विनञ्चपर्या- याश्चः इति। अथ ये प्रवृत्तेऽर्थेऽमिताक्षरेषु ग्रन्थेषु वाक्यपूरणा आगच्छन्ति पदपूरणा स्ते मिताक्षरेष्व् अनर्थकाः। 'कम्' 'ईम्' 'इत्' 'उ' इति। “निष्टृ॒ वक्त्रासँश्चिदिन्नरो भूरितो॑ वृकादिव। विभ्य- स्यन्तो ववाशिरे शिशिरं जीवनाय कम्”॥ शिशिरं शृणातेः। शम्नातेर्वा “एमेनं सृजता सुते।” आशु-

  • जतैनं सुते। तमिद्वर्द्धन्तु नो गिरः।” स्तुतयो