भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

हिन्दी निरुक्त । ७१ ह्रादतेर्वा स्यात् शीतीभाव-कर्मणः । अथापि समु- च्चयार्थे भवति ॥ ४ ॥ • अर्थ—“अक्षण्वन्तः” [ ऋ० सं० ८, २, ३४, २ ] [१म पादार्थ-] (सभी मनुष्य) आँखवाले, कानवाले या समान इन्द्रियवाले और समान शास्त्रोंमें श्रम किये हुये हैं। [ एक पद निरुक्त-] 'अक्षि' दर्शनार्थ 'चक्ष्' (अ० आ०) धातुसे बनता है। व्यक्ति अर्थवाले 'अञ्ज्' (रु० प०) धातुसे होता है,—यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। जिस कारण कि ये और अङ्गोंसे अधिक स्पष्ट या प्रकाशंतर हैं [क्योंकि—रात्रिको विचरनेवाले जन्तुओंके ये अन्धकारमें भी दिखाई देते हैं ] इसीसे इनका 'अक्षि'-यह नाम है,-यह ब्राह्मणमें जाना गया है। 'कर्ण' शब्द छेदनार्थक 'कृत्' धातुसे बनता है। [क्योंकि-] इसका द्वार कटा हुआ होता है। 'ऋच्छ' धातुसे होता है,—यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। [क्योंकि-] आकाश में प्रकट हुए हुये शब्द इनकी ओर जाते हैं,-और ये भी उनके सामने लेनेके लिये जाते हैं,-यह ब्राह्मणमें जाना गया है। [२य पादार्थ-] [तो भी-] मनकी दौड़ या कल्पनामें बराबर नहीं होते हैं। [३य पादार्थ-] [किन्तु] कोई विद्वान् कल्पनामें मुखके बराबर भरे हुये पानी वाले तडागके समान हैं। और कोई काखके बराबर भरे हुये तडागके समान हैं। [एक पद निरुक्त-] 'आस्य' शब्द असु क्षेपणे धातुसे बनता है [क्योंकि-इसके सामने अन्न फेंका जाता है।] अथवा ['स्यन्दू प्रस्रवणे धातुसे ।] [क्योंकि-] अन्न इसे गीला कर देता है। अर्थात् सूखा अन्न आने पर भी यह लाल छोड़ता है, जिससे कि—गीला हुआ अन्न खाया जासके। 'दघ्न' शब्द स्रवण या झरने अर्थमें 'दघ्' धातुसे बनता है। [क्योंकि—अगले परिमाणसे अधिक बहा हुआ होता है।] अथवा

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 79, कुल 1282 में से · BharatKosha