भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 806

हिन्दी निरुक्त ( ३४ ) ७ अ० १ पा० १ खं० और उन से उनके भिन्न २ नाम हो सकते हैं। इस से उन की युक्ति व्यभिचारिणी है। हां यदि वे एकत्व का आग्रह करें ही तो स्थान की या संभोग की एकता से सब देवताओं की एक २ स्थान में एकता हो सकती है, इस गौण एकता से वे संतुष्ट हो सकते हैं । संस्थान की एकता से प्रयोजन-शरीर की बनावट या रूप रंग तथा देशकी समानता से भी है। जैसे-हिन्दुस्थानी, जापानी, अंग्रेज आदि अपने २ देशों में अनेक होने पर भी एक २ नाम से बोले जाते हैं। यही प्रकार पृथिवी आदि लोकों के देवताओं की एकता का भी है। एवम्-संभोग की एकता से प्रयोजन- खान पान और वेष आदि की तुल्यता से है। इस के लिये भी पूर्वोक्त उदा- हरण ही उपयुक्त हो सकते हैं। इस तुल्यता में भिन्न लोकों के देवताओं की भी परस्पर में एकता आजाती है, इतना अधिकस्वारस्य है । क्योंकि अग्नि के द्वारा पार्थिव हविः के रूप में पृथिवी के संभोग मध्यम्लोक और उत्तम लोक में पहुंच जाते हैं। और पर्जन्य, वायु और आदित्य देवताओं से उनके लोक के वृष्टि, वायु तथा आतप आदि का संभोग पृथिवी में आजाता है। जिस से ओषधि आदि की उत्पत्ति होती है यही इनका परस्पर का उपकार समान संभोग है, और इसी से ये तीनों भी एक समझे जा सकते हैं। ये दोनों प्रकार की एकताएं गौण ही हैं, किन्तु तात्विक नहीं यह याज्ञिकों के मत का अभिप्राय है। आचार्य के मत से दोनों पक्ष समान हैं। आचार्य इन दोनों मतों पर अपनी सम्मति “नरराष्ट्र”