निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 805, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३ ) ७ अ० २ पा० १ खं० नैरुक्तों के मत पर सन्देह होता है कि-ये एक २ स्थान में एक २ ही देवता को स्वीकार करके कुल तीन देवता मानते हैं, किन्तु निघण्टु शास्त्रमें उक्तरीति से बहुत्तर नाम पढे हुये हैं इससे नैरुक्तों का मत निघण्टु के विरुद्ध पड़ता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि-ये सब नाम यथास्थान एक २ देवता के ही हैं, एक देवता ही नाना कर्म के लिये नाना रूप धारण करता है और उन्हीं नाना रूपोंके ये नाना नाम हैं अथवा एक ही रूप से वह देवता अनेक कर्म करता है, तथा उन कर्मों के कारण उस एक ही स्वरूप के अनेक नाम हो जाते हैं अतः नामों के आधिक्य से नैरुक्तों के मत में देवता संख्या में कोई दोष नहीं आता । याज्ञक लोग कहते हैं कि-जिस स्थानमें जितने देवताओं के नाम कहे हैं वे सब अलग २ देवताओं के ही हैं। क्योंकि- पृथक् २ नामों से पृथक् २ स्तुतिऐं आती हैं, अनेक नामों से एकसी स्तुति नहीं और जिस नाम से जिस देवता का यज्ञ आरम्भ होता है, उसी नाम से उस देवता का वह पूर्ण होता है। यदि वैश्वानर नाम से हविः का ग्रहण हुआ, तो वह वैश्वानर नाम से ही दिया जाता है, या होम किया जाता है, किन्तु उसी स्थान के दूसरे अग्नि आदि नाम से नहीं। यदि अभेद होता तो कभी भिन्न नाम से लिया हुआ हविः भिन्न नाम से होम भी किया जाता है। सर्वथा सब नाम भिन्न २ देवताओं के हैं और देवता नाना हैं, न तीन हैं और न एक । नैरुक्तों के मत में जिस प्रकार कर्म के भेदसे एकके अनेक नाम हो सकते हैं, उसी प्रकार बहुतों के भी भिन्न २ कर्म