निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२ ) ७ अ० २ पा० १ खं० समूह के स्थल में दो बुद्धिएं हैं,-एक ‘नराः’ ‘बहुत नर’ और दूसरी “ राष्ट्रम् ” ‘नर समूह’ । यहां जो नरसमूह को वास्तविक ( यथार्थ ) समझते हैं, उनको एकत्व मुख्य और अनेकत्व गौण हैं और जो बहुत नरों को ही ठीक समझते हैं, उनके मतमें अनेकत्व यथार्थ और एकत्व अयथार्थ या गौण या कल्पनामात्र है । प्रयोजन यह निकला कि आत्मा या देवतातत्त्व के एकत्व अनेकत्व का विचार इसी दृष्टान्त के सदृश है, जहां अनेकत्व है, वहां एकत्व बन जाता है, और जहां एकत्व तहां अनेकत्व । युक्ति से उभयथा संभव है, इस से ऐसे स्थलों में ऐसे विकल्पों से सन्देह सरन न होना चाहिए ॥ १ ( ५ ) ॥ व्याख्या । इस खण्ड में नैरुक्तों और याजकों के मतसे देवताओं की संख्या का निर्णय किया है। नैरुक्तों के मतमें केवल तीन देवता हैं- अग्नि, इन्द्र और आदित्य । ये तीनों देवता क्रमसे पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान में रहते हैं या इनका तहां २ आधिपत्य है । इसी प्रकार याजकों के मत में उतने ही देवता हैं, जितने देवताओं के नाम मन्त्रों में मिलते हैं, उन की कोई संख्या नियत नहीं। यही नानात्व पक्ष कहलाता है। “निघण्टु” शास्त्र के पञ्चमाध्याय (दैवतकाण्ड) में १५१ देवताओं के नाम हैं, उन में अग्नि आदि ५२ नाम पृथिवी स्थान देवताओं के वायु आदि अड़सठ ( ६८) नाम मध्यम देवताओं के और अश्विनी आदि ३१ नाम उत्तम- स्थान देवताओं के हैं । इस मूलग्रन्थ पर - ध्यान देनेसे