निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 803, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१ ) ७ अ० २पा०१ खं० देवताओं के नाम आते हैं, उतने ही अलग २ देवता हो सकते हैं, न एक और न तीन। क्योंकि स्तुतियाँ अलग २ हैं। वैसे ही नाम ( भी अलग २ हैं ) । “यथो एतत्०” जो कि यह (कहा है-) 'कर्म के भेद से ( नामों का भेद है, किन्तु वस्तु (देवता के भेद से नहीं ? ) यह । (वह ठीक नहीं, क्योंकि-) बहुत (मनुष्य) भी विभाग करके (अलग २ होकर या बांटकर ) कर्मों को (अलग २ क्रियाओं को) कर सकते हैं । “तत्र०” उस (भेद पक्ष देवतानानात्वपक्ष ) में संस्थान की एकता और संभोग की एकता देखना चाहिये-दूसरे (या- ज्ञिक या आत्मवित् ) जो एकता मानते हैं, वह गौण बुद्धि से है, किन्तु वास्तवमें नहीं, और वह (गौण एकता) स्थान की एकता से तथा भोग की एकता से लेना चाहिए। जैसे-पृथिवी ( स्थान ) में मनुष्य, पशु, और देवता हैं, इनका एक स्थान और एक संभोग है-खान पान निद्रा मैथुन आदि सब समान है, ऐसा देखा जाता है, (इस से 'पृथिवी' के कहने से ये सब समझ लिये जाते हैं, - पृथिवी ऐसा करती है, पृथिवी ऐसा मानती है)। जैसे पृथिवी को पर्जन्य (मध्यम देव इन्द्र) से और वायु आदित्य दोनों से संभोग है, और दूसरे (अन्तरिक्ष या द्यु ) लोक को अग्नि से (संभोग है)। ( दोनों पक्षों को समान दृष्टान्त ) “तत्र एतत् नरराष्ट्रमिव” उन (एक के अनेक नाम मानने वालों और अनेकों के अनेक नाम मानने वालों ) में “नर-राष्ट्र के समान” यह है अर्थात्-एक ही नर