निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३० ) ७ अ० २ पा० १ खं०
यथो एतत्, कर्मपृथक्त्वाद्-इति । बहवोऽपि
विभज्य कर्माणि कुर्युः ।
तत्र संस्थानैकत्वं संभोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् ।
यथा पृथिव्यां मनुष्याः पशवो देवा इति स्थानैक-
त्वं च संभोगैकत्वं च दृश्यते । यथा पृथिव्याः
पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः, अग्निना
च इतरस्य लोकस्य ॥
तत्र एतत्-नरराष्ट्रमिव ॥ (१) (५) ॥
अर्थ:-तीन ही देवता हैं, यह नैरूक्त (आचार्य मानते हैं)
( क ) अग्नि पृथिवीस्थान या पृथिवी में रहने वाला
( पहला देवता ) है ।
( ख ) अग्नि वायु अथवा इन्द्र अन्तरिक्षस्थान या अन्त-
रिक्ष ( आकाश ) में रहने वाला ( दूसरा देवता ) है ।
( ग ) सूर्य द्युस्थान या द्युलोकनिवासी ( तीसरा
देवता ) है ।
“तासां०” उन (देवताओं) के माहाभाग्य (महत् ऐश्वर्य)
से एक २ के भी बहुत नाम हैं ।
“अथवा कर्म०” अथवा कर्म (क्रिया) के भेद से ( एक २
के बहुत नाम हैं ) । जैसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, ये
( नाम ) एक होते हुए के भी ( अनेक नाम हैं ) ।
( याज्ञिक मत )
“अपिवा पृथ०” अथवा पृथक् ही हों-मन्त्रों में जितने