भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 802

हिन्दी निरुक्त ( ३० ) ७ अ० २ पा० १ खं० यथो एतत्, कर्मपृथक्त्वाद्-इति । बहवोऽपि विभज्य कर्माणि कुर्युः । तत्र संस्थानैकत्वं संभोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् । यथा पृथिव्यां मनुष्याः पशवो देवा इति स्थानैक- त्वं च संभोगैकत्वं च दृश्यते । यथा पृथिव्याः पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः, अग्निना च इतरस्य लोकस्य ॥ तत्र एतत्-नरराष्ट्रमिव ॥ (१) (५) ॥ अर्थ:-तीन ही देवता हैं, यह नैरूक्त (आचार्य मानते हैं) ( क ) अग्नि पृथिवीस्थान या पृथिवी में रहने वाला ( पहला देवता ) है । ( ख ) अग्नि वायु अथवा इन्द्र अन्तरिक्षस्थान या अन्त- रिक्ष ( आकाश ) में रहने वाला ( दूसरा देवता ) है । ( ग ) सूर्य द्युस्थान या द्युलोकनिवासी ( तीसरा देवता ) है । “तासां०” उन (देवताओं) के माहाभाग्य (महत् ऐश्वर्य) से एक २ के भी बहुत नाम हैं । “अथवा कर्म०” अथवा कर्म (क्रिया) के भेद से ( एक २ के बहुत नाम हैं ) । जैसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, ये ( नाम ) एक होते हुए के भी ( अनेक नाम हैं ) । ( याज्ञिक मत ) “अपिवा पृथ०” अथवा पृथक् ही हों-मन्त्रों में जितने