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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३१ ) ७ अ० २पा०१ खं० देवताओं के नाम आते हैं, उतने ही अलग २ देवता हो सकते हैं, न एक और न तीन। क्योंकि स्तुतियाँ अलग २ हैं। वैसे ही नाम ( भी अलग २ हैं ) । “यथो एतत्०” जो कि यह (कहा है-) 'कर्म के भेद से ( नामों का भेद है, किन्तु वस्तु (देवता के भेद से नहीं ? ) यह । (वह ठीक नहीं, क्योंकि-) बहुत (मनुष्य) भी विभाग करके (अलग २ होकर या बांटकर ) कर्मों को (अलग २ क्रियाओं को) कर सकते हैं । “तत्र०” उस (भेद पक्ष देवतानानात्वपक्ष ) में संस्थान की एकता और संभोग की एकता देखना चाहिये-दूसरे (या- ज्ञिक या आत्मवित् ) जो एकता मानते हैं, वह गौण बुद्धि से है, किन्तु वास्तवमें नहीं, और वह (गौण एकता) स्थान की एकता से तथा भोग की एकता से लेना चाहिए। जैसे-पृथिवी ( स्थान ) में मनुष्य, पशु, और देवता हैं, इनका एक स्थान और एक संभोग है-खान पान निद्रा मैथुन आदि सब समान है, ऐसा देखा जाता है, (इस से 'पृथिवी' के कहने से ये सब समझ लिये जाते हैं, - पृथिवी ऐसा करती है, पृथिवी ऐसा मानती है)। जैसे पृथिवी को पर्जन्य (मध्यम देव इन्द्र) से और वायु आदित्य दोनों से संभोग है, और दूसरे (अन्तरिक्ष या द्यु ) लोक को अग्नि से (संभोग है)। ( दोनों पक्षों को समान दृष्टान्त ) “तत्र एतत् नरराष्ट्रमिव” उन (एक के अनेक नाम मानने वालों और अनेकों के अनेक नाम मानने वालों ) में “नर-राष्ट्र के समान” यह है अर्थात्-एक ही नर

हिन्दी निरुक्त ( ३२ ) ७ अ० २ पा० १ खं० समूह के स्थल में दो बुद्धिएं हैं,-एक ‘नराः’ ‘बहुत नर’ और दूसरी “ राष्ट्रम् ” ‘नर समूह’ । यहां जो नरसमूह को वास्तविक ( यथार्थ ) समझते हैं, उनको एकत्व मुख्य और अनेकत्व गौण हैं और जो बहुत नरों को ही ठीक समझते हैं, उनके मतमें अनेकत्व यथार्थ और एकत्व अयथार्थ या गौण या कल्पनामात्र है । प्रयोजन यह निकला कि आत्मा या देवतातत्त्व के एकत्व अनेकत्व का विचार इसी दृष्टान्त के सदृश है, जहां अनेकत्व है, वहां एकत्व बन जाता है, और जहां एकत्व तहां अनेकत्व । युक्ति से उभयथा संभव है, इस से ऐसे स्थलों में ऐसे विकल्पों से सन्देह सरन न होना चाहिए ॥ १ ( ५ ) ॥ व्याख्या । इस खण्ड में नैरुक्तों और याजकों के मतसे देवताओं की संख्या का निर्णय किया है। नैरुक्तों के मतमें केवल तीन देवता हैं- अग्नि, इन्द्र और आदित्य । ये तीनों देवता क्रमसे पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान में रहते हैं या इनका तहां २ आधिपत्य है । इसी प्रकार याजकों के मत में उतने ही देवता हैं, जितने देवताओं के नाम मन्त्रों में मिलते हैं, उन की कोई संख्या नियत नहीं। यही नानात्व पक्ष कहलाता है। “निघण्टु” शास्त्र के पञ्चमाध्याय (दैवतकाण्ड) में १५१ देवताओं के नाम हैं, उन में अग्नि आदि ५२ नाम पृथिवी स्थान देवताओं के वायु आदि अड़सठ ( ६८) नाम मध्यम देवताओं के और अश्विनी आदि ३१ नाम उत्तम- स्थान देवताओं के हैं । इस मूलग्रन्थ पर - ध्यान देनेसे

हिन्दी निरुक्त ( ३३ ) ७ अ० २ पा० १ खं० नैरुक्तों के मत पर सन्देह होता है कि-ये एक २ स्थान में एक २ ही देवता को स्वीकार करके कुल तीन देवता मानते हैं, किन्तु निघण्टु शास्त्रमें उक्तरीति से बहुत्तर नाम पढे हुये हैं इससे नैरुक्तों का मत निघण्टु के विरुद्ध पड़ता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि-ये सब नाम यथास्थान एक २ देवता के ही हैं, एक देवता ही नाना कर्म के लिये नाना रूप धारण करता है और उन्हीं नाना रूपोंके ये नाना नाम हैं अथवा एक ही रूप से वह देवता अनेक कर्म करता है, तथा उन कर्मों के कारण उस एक ही स्वरूप के अनेक नाम हो जाते हैं अतः नामों के आधिक्य से नैरुक्तों के मत में देवता संख्या में कोई दोष नहीं आता । याज्ञक लोग कहते हैं कि-जिस स्थानमें जितने देवताओं के नाम कहे हैं वे सब अलग २ देवताओं के ही हैं। क्योंकि- पृथक् २ नामों से पृथक् २ स्तुतिऐं आती हैं, अनेक नामों से एकसी स्तुति नहीं और जिस नाम से जिस देवता का यज्ञ आरम्भ होता है, उसी नाम से उस देवता का वह पूर्ण होता है। यदि वैश्वानर नाम से हविः का ग्रहण हुआ, तो वह वैश्वानर नाम से ही दिया जाता है, या होम किया जाता है, किन्तु उसी स्थान के दूसरे अग्नि आदि नाम से नहीं। यदि अभेद होता तो कभी भिन्न नाम से लिया हुआ हविः भिन्न नाम से होम भी किया जाता है। सर्वथा सब नाम भिन्न २ देवताओं के हैं और देवता नाना हैं, न तीन हैं और न एक । नैरुक्तों के मत में जिस प्रकार कर्म के भेदसे एकके अनेक नाम हो सकते हैं, उसी प्रकार बहुतों के भी भिन्न २ कर्म

हिन्दी निरुक्त ( ३४ ) ७ अ० १ पा० १ खं० और उन से उनके भिन्न २ नाम हो सकते हैं। इस से उन की युक्ति व्यभिचारिणी है। हां यदि वे एकत्व का आग्रह करें ही तो स्थान की या संभोग की एकता से सब देवताओं की एक २ स्थान में एकता हो सकती है, इस गौण एकता से वे संतुष्ट हो सकते हैं । संस्थान की एकता से प्रयोजन-शरीर की बनावट या रूप रंग तथा देशकी समानता से भी है। जैसे-हिन्दुस्थानी, जापानी, अंग्रेज आदि अपने २ देशों में अनेक होने पर भी एक २ नाम से बोले जाते हैं। यही प्रकार पृथिवी आदि लोकों के देवताओं की एकता का भी है। एवम्-संभोग की एकता से प्रयोजन- खान पान और वेष आदि की तुल्यता से है। इस के लिये भी पूर्वोक्त उदा- हरण ही उपयुक्त हो सकते हैं। इस तुल्यता में भिन्न लोकों के देवताओं की भी परस्पर में एकता आजाती है, इतना अधिकस्वारस्य है । क्योंकि अग्नि के द्वारा पार्थिव हविः के रूप में पृथिवी के संभोग मध्यम्लोक और उत्तम लोक में पहुंच जाते हैं। और पर्जन्य, वायु और आदित्य देवताओं से उनके लोक के वृष्टि, वायु तथा आतप आदि का संभोग पृथिवी में आजाता है। जिस से ओषधि आदि की उत्पत्ति होती है यही इनका परस्पर का उपकार समान संभोग है, और इसी से ये तीनों भी एक समझे जा सकते हैं। ये दोनों प्रकार की एकताएं गौण ही हैं, किन्तु तात्विक नहीं यह याज्ञिकों के मत का अभिप्राय है। आचार्य के मत से दोनों पक्ष समान हैं। आचार्य इन दोनों मतों पर अपनी सम्मति “नरराष्ट्र”

हिन्दी निरुक्त ( ३५ ) ७ अ० २ पा० २ खं० के दृष्टान्त से यह देते हैं कि- नर बुद्धि करने से वे ही बहुत हैं, और राष्ट्र बुद्धि करने से वे ही एक हैं, केवल विचारक की दृष्टि का भेद ही विशेष है, वास्तव में दोनों मत एक जैसे हैं तथा ठीक हैं। यही दृष्टान्त तीसरे एकात्मवाद में भी अनु- कूल है। भाष्यकार के इस अन्तिम वाक्य से उनकी अद्वैतनिष्ठा का भी पता चलता है जहां कहीं भी पर्यवसान करते हैं अनु- गत अर्थ पर ही करते हैं, किन्तु किसी विशेष पक्ष पर नहीं। इसी भाव का परिचय इससे अग्रिम देवताकार चिन्तन खण्ड में भी देंगे। “अपिवा उभयविधाःस्युः” (७,२,३) “वायुर्वा इन्द्रोवा” यद्यपि वायु और इन्द्र एक ही देवता है, इस से इस स्थान में एक ही नाम रखना उचित था, तथापि वायुरूप से वह सदा प्रत्यक्ष है, इससे 'वायु' शब्द रखा है और मध्यम ज्योति के सब नामों में अधिक प्रसिद्ध होने के कारण 'इन्द्र' नाम भी दिया है। प्रयोजन यह कि-पहिले नाम का अर्थ प्रसिद्ध है और दूसरा स्वयम् प्रसिद्ध है इससे दोनों नामों का यहाँ स्वारस्य देख कर दोनों का ही उपादान किया है। ऐसा कारण अन्य दो ज्योतियों में नहीं था, इसी से वहां एक २ नाम ही दिया है ॥ १ ( ५ ) ॥ ( खं० २ ) ( निरु०- ) अथ आकारचिन्तनं देवतानाम् । पुरुषविधाः स्युः-इति एकम् । (क) चेतनावद्वद् हि स्तुतयो भवन्ति । (ख) तथा अभिधानानि ।

हिन्दी निरुक्त \qquad ( ३६ ) \qquad ७ अ० २ पा० ३ खं० (ग) अथापि पौरुषविधिकैः अङ्गैः संस्तूयन्ते । $^{१}$“ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू” [ऋ०सं०४, ७, ३१, ३] । $^{२}$“यत्सङ्गृभ्णा मघवन् काशिरित्ते” [ऋ० सं० ३, २, १, ५] । (घ) अथापि पौरुषविधिकैर्द्रव्यसंयोगैः । $^{३}$“आद्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र याहि” [ऋ०सं०२, ६, २१, ४] । $^{४}$“कल्याणी र्जाया सुरणं गृहे ते” [ऋ० सं० ३, ३, २०, १] । (ङ) अथापि पौरुषविधिकैः कर्मभिः । $^{५}$“अद्धा॑न्द्र पिब च प्रस्थितस्य ।” [ऋ० सं० ८, ६, २१, २] । $^{६}$“आ श्रुत्कर्ण श्रुधीहवम् ।” ऋ०सं० १, १, २० ३] । २ ( ६ ) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) अपुरुषविधाः स्युः- इति-अपरम् ।

हिन्दी निरुक्त ( ३७ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० अपि तु यद् दृश्यते अपुरुषविधंतत् । यथाअग्निः, वायुः, आदित्यः चन्द्रमा-इति । (क) यथो एतत्-“चेतनावद्वद् हि स्तुतयो भवन्ति” इति, अचेतनानि अपि एवं स्तूयन्ते । यथा-अक्ष- प्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि ॥ (ख) यथो एतत्-“पौरुषविधिकैः अङ्गैः सस्तू- यन्ते ” इति, अचेतनेषु अपि एतद् भवति । “अभिक्रन्दन्ति हरितेभि रासभिः । ” [ऋ०सं० ८, ४, २९, २ ] । इति ग्रावस्तुतिः ॥ (ग) यथो एतत्-“ पौरुषविधिकै र्द्रव्यसंयोगैः” इति एतदपि तादृशमेव । “सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनम् ” । [ ऋ० सं० ८, ३, ७, ४ ] । (घ) यथो एतत्-“पौरुषविधिकैः कर्मभिः ” इति, एतदपि तादृशमेव । “ होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत ” [ ऋ०सं० ८, ४, २९, २ ] । इति ग्रावस्तुतिरेव ॥ अपि वा उभयविधाः स्युः ॥

अपि वा पुरुषविधानामेव सतां कर्मात्मानः एते स्युः, यथा यज्ञो यजमानस्य ॥ एष च आख्यानसमयः ॥ ३ [७] ॥ इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ७, २ ॥ ( खं० २ ) ( देवताओं के आकार की चिन्ता । ) अर्थः- “ अथ० ” यहां से देवताओं के आकार का चिन्तन होता है । “ पुरुषविधाः० ” पुरुष सरीखे ( देवता ) हैं-देवता- ओं का आकार पुरुषों जैसा है। यह एक ( मत है ) । ( इस मत की युक्तिएं ) (क) “ चेतनावद्वद्०” क्योंकि-चेतनावानों की जैसी स्तुतिएँ होती हैं। (ख) “ तथा० ” वैसे ही अभिधान या संवाद हैं- संवाद सूक्तों में मनुष्यों के समान प्रश्न उत्तर देखे जाते हैं। (ग) “ अथापि० ” और भी पुरुषों के जैसे अङ्गों से स्तुति किये जाते हैं ( जैसे-) “ ऋष्वात० ” हे इन्द्र ! तुम महान् के शत्रुओं के नाश करने वाले दोनों भुजाओं की हम उपासना करते रहें । “ यत्संगृभ्णा० ” हे मघवन् ! इन्द्र ! जो तू (अपार द्यावापृथिवीओं को ) पकड़लेता है, तेरी मुष्टि (मुट्ठी ) बड़ी है । [ अ० ६, पा० १ खं० २ ]

हिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० (घ) "अथाऽपि०" और भी पुरुषों के द्रव्यों जैसे द्रव्यों के संयोगों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)। जैसे- "आद्वाभ्याम्०" हे इन्द्र ! दो ही घोड़ों से आ-यदि तेरे पास दो ही घोड़े हों तो उन्हीं को रथ में जोड़ कर हमारे यज्ञ में आ। "कल्याणीर्जाया०" तेरे घर में कल्याणी (शुभगुणवती) सुन्दर भार्या है। (ङ) "अथापि०" और भी पुरुष सरीखे कर्मों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)। (जैसे-) "अद्धीन्द्र०" हे इन्द्र ! तू प्रस्तुत (सोम) को खा और पी। "आश्रुत्कर्ण ! ०" हे सुन्दर कान वाले² (हमारे) आवाहन को सुन। (खं० ३) (दूसरा मत) "अपुरुषविधाः०" पुरुषों से भिन्न प्रकार (आकार) के देवता हैं (यह और (मत) है। (इस मतकी युक्ति) "अपि तु यद्०" क्योंकि जो कुछ (देवताओं का) देखा जाता है, वह अपुरुष सरीखा (पुरुषों से भिन्न प्रकार का) है। जैसे अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमाः। (प्रथम मत का खण्डन) (क) "यथो एतत्०" जो कि यह (कहा)- "चेतना-

हिन्दी निरुक्त ( ४० ) ७ अ० २ पा० ३ खं० वानों की स्तुतियां होती हैं,” यह, अचेतन भी वैसे ही स्तुति किये जाते हैं। जैसे अक्ष (पासे) आदि ओषधि- पर्यन्त। (ख ग) “यथो एतत्०” जो कि यह (कहा)- “पुरुष सरीखे अङ्गों से स्तुति किये जाते हैं” यह, अचेतनों में भी यह है। (जैसे-) “अभिक्रन्दन्त०” (पाषाण = लोढे) हरे २ मुखों से बुलाते हैं। यह ग्राव (पाषाण) स्तुति है। (घ) “यथो एतत्” जो कि- यह (कहा-) “पुरुष सरीखे द्रव्यसंयोगों से” यह, यह भी ऐसा ही है। “सुखं रथं०” सिन्धु (नदी) ने सुखदायी घोड़ों वाले रथ को जोड़ा। (ङ) “यथो एतत्०” जो कि- यह (कहा-) “पुरुषों सरीखे कर्मों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)” । यह भी वैसा ही है। (जैसे-) “होतुश्चित्०” होता (अग्नि) से पहिले ही (ये पाषाण) अद्य (भक्षणीय सोमरस) हविः को अशन (भोजन) कर लेते हैं। यह ग्रावों (पाषाणों) की स्तुति ही है। (तीसरा मत) “अपिवा उभयविधाः स्युः” अथवा दोनों प्रकार के (देवता) हैं- पुरुषाकार और अपुरुषाकार [क्यों कि- दोनों ही प्रकार के प्रमाण प्राप्त हैं।]

हिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० रूप में सदा पुरुषाकार रहता है, और अग्नि, वायु आदि कर्म रूपों से सदा ही अपुरुषाकार रहता है। इनमें तीसरा यास्कमत और चौथा आख्यानमत है ही। इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥७ (२)॥ (खंड २) १- "ऋष्वात इन्द्र०"। शंयु ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। एकादशिनी में इन्द्र के पशुकी याज्या। २- "यत्तसंगृभ्णा०" की व्याख्या हो चुकी (अ० ६ पा० १ खं० २)। ३- " आद्वाभ्यां० " गृतसमद ऋषि। इन्द्र देवता। त्रिष्टप् छन्दः। ४- "अपाःसोम ०"-० कल्याणीर्जाया" विश्वामित्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। हारियोजन की अनुवाक्या। ५- " इदं हविर्मघवन्०-०"अद्धीन्द्र पिब च"। अग्नियुत नाम स्थूरपुत्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ६- "आश्रुत्कर्ण"मधुच्छन्दस् ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ( खं० ३ ) ७-"एते वदन्ति०-०अभिक्रन्दन्ति०" अर्बुद ऋषि। जगती छन्दः। ग्रावस्तुति। ८-"सुखं रथं युयुजे"। सिन्धुक्षित् नाम प्रियमेधस् का पुत्र ऋषि। जगती छन्दः। नदी की स्तुति। ९-"एते वदन्ति०-०"होतुश्चित्०"। वही ऋचा (अ० ७, पा० १, खं. ३)

हिन्दी निरुक्त (४३) ७ अ० ३ पा० १ खं० तृतीयः पादः। (खं० १) (निरु०-) तिस्रएव देवता इत्युक्तं पुरस्तात् । तासां भक्तिसाहचर्यं व्याख्यास्यामः ॥ अथ एतानि अग्निभक्तीनि-अयं लोकः, प्रातः सवनं, वसन्तो, गायत्री, त्रिवृत्स्तोमो, रथन्तरं साम, ये च देवगणाः समाम्नाताः प्रथमे स्थाने, अग्नायी, पृथिवी, इला,-इति स्त्रियः । अथ अस्य कर्म-वहनं च हविषाम्, आवाहनं च देवतानां, यच्च किंचिद् दार्ष्टिविषयिकम् अग्नि कर्मैव तत्। अथ अस्य संस्ताविका देवाः-इन्द्रः, सोमो, वरुणः, पर्जन्यः, ऋतवः । आग्नावैष्णवं च हविः, नतु- ऋक् संस्ताविकी दशतयीषु विद्यते । अथापि आ- ग्नापौष्णं हविः, नतु संस्तवः, तत्र एतां विभक्ति- स्तुतिम् ऋचम् उदाहरन्ति- ॥ १ (८) ॥ अर्थ :-तीन ही देवता हैं, यह पहिले कहा गया है। उन देवताओं के भक्ति साहचर्य (जो २ उनका भाग है, और उनके साथ रहता है) को व्याख्यान करेंगे; “अथ०” यहां से ये अग्नि के भाग हैं,-अग्नि की निज की वस्तुएं हैं. इन से अग्नि का नित्य संबन्ध है- जहां ये

हिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ७ अ० ३ पा० १ खं०

वस्तुएं हैं, वहां अग्नि का संबन्ध रहता है- अग्नि का प्रत्यक्ष मान न रहने पर भी, वहां अग्नि समझा जाता है,- यही प्रयोजन भी इनके कहने का है कि- इनका और अग्नि का संबन्ध उजाल होजावे या प्रकट हो जावे । [ वे कौन ?- ] “अयं लोक०”। यह लोक-पृथिवी लोक । प्रातःसवन । वसन्त ऋतु । गायत्री छन्द । त्रिवृत् स्तोम । रथन्तर साम । और जो देवगण प्रथम स्थान ( नि० अ० ५ खं० १-२-३ ) में गिनाए हैं । अग्नायी, पृथिवी, इळा, ये स्त्रियें । अब इसका कर्म-हवियों का वहन-देवताओं के पास पहुंचाना । और देवताओं का आवाहन = बुलाना । और जो कुछ दृष्टि सम्ब- न्धि विषय है, वह अग्नि का ही कर्म है । अब इस के संस्त- विक देवता हैं-जिन के साथ इस (अग्नि) की स्तुति होती है ।—इन्द्र, सोम, वरुण, पर्जन्य और ऋतुएं । और आग्ना- वैष्णव हवि है, किन्तु दश मंडल ऋग्वेद में साथ स्तुति की ऋचा नहीं है—अग्नि देव विष्णु के साथ हविः का भोजन तो करते हैं, पर किसी ऋचा में एक साथ स्तुति नहीं सुनते । देवताओं में सन्मान के ये दो अधिकार हैं- सहभोजन और सहस्तवन, इन में से कोई एक अधिकार पा जाता है और कोई दोनों को भी,-इसी प्रकार पृथिवी लोक के ईश्वर अग्नि देव के यहां विष्णु देवता सहभोज का अधिकार पाए हुये हैं, किन्तु एक साथ एक ऋचा में स्तुति का नहीं । और भी आग्नापौष्ण-अग्नि और पूषाका हविः है, किन्तु संस्तव नहीं । तहां एक अलग स्तुति की ऋचा उदाहरण देते हैं-जिस एक ही ऋचा में अलग २ वाक्यों से दोनों की स्तुति है-ऋचा तो एक ही है पर स्तुति क्रम से अलग २ होती है-॥१(८)॥

हिन्दी निरुक्त ( ४५ ) ७ अ० ३ पा० २ खं० ( खं० २ ) (निरु०-) “पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्रविद्वाननष्ट पशु भुवनस्य गोपाः । सत्वैतेभ्यः परिददत् पितृभ्योऽ- ग्निद्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः ॥” [ऋ०सं०७,३,२३,३] पूषा त्वा इतः प्रच्यावयतु, विद्वान् अनष्टपशुः भुवनस्य गोपाः इति एष हि सर्वेषां भूतानाम् गोपायिता आदित्यः “सत्वैतेभ्यः परिददत् पि- तृभ्यः”-इति सांशयिकस्तृतीयः पादः । ‘पूषा’ पुरस्तात्, तस्य अन्वादेशः-इति एकम्। ‘अग्निः’ उपरिष्टात्, तस्य प्रकीर्त्तना-इति अपरम् “अग्निद्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः” । सुविदत्रं धनं भवति । विन्दतेर्वा एकोपसर्गात् । दयतेर्वास्याद् द्व्युपसर्गात् ॥ २ (९) ॥ अर्थः-“पूषात्वेतः” इस ऋचा का देवश्रवस् यामायन (यम का पुत्र) ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, और शव (मुर्दे) के कान में प्रमीत (प्रेत) के अनुमन्त्रण में विनियोग है । उस प्रेत से कहा जाता है- ‘पूषा’ भगवान् आदित्य (मार्गों का अधिपति) ‘त्वा’ तुझे ‘इतः’ (मनुष्यलोकात्) इस मनुष्य लोक से (विशेष मार्ग के द्वारा) ‘प्रच्यावयतु’ हटावे या ले जावे, ‘विद्वान्’ जो आदित्य देव विद्वान् है-उसका ज्ञान किसी विषय में रुकता नहीं है-

हिन्दी निरुक्तं ( ४६ ) ७ अ० ३ पा० २ खंड कोई ऐसा विषय नहीं जिसे वह अच्छी तरह न समझ सकें इसी से उस के प्रबन्ध में तुझे जाने से लाभ ही हो सकता है, हानि नहीं, 'अनष्टपशुः' इसी से उसका पशु नष्ट नहीं होता उसकी पूजा बन्ध नहीं होती ( जो अपने काम को भले प्रकार जानने वाला होता है, और अपने कर्तव्य को ठीक पालन करता रहता है, उसका काम कभी बन्ध नहीं होता ।) ' भुवनस्य गोपाः ' और प्राणिमात्रका गोपायिता = रक्षक है, 'सः' वह ऐसा पूषा देव 'त्वा' तुझे ( यहाँ से लेजाकर ) 'एतेभ्यः' ( चन्द्रमण्डलोपान्तंवासिभ्यः) इन चन्द्रमण्डल के पास रहने वाले 'पितृभ्यः' पितरों के लिये 'परिददत्' (परि- ददातु ) देदेवे । [ सो कहा भी है- “दक्षिणायनात् पितृ- लोकम् ” सूर्य के दक्षिणायन कालमें पितृ लोक को जाता है । ] 'अग्निः' और अग्नि देव भी 'सुविद्रियेभ्यः' धनवाले 'देवेभ्यः' देवताओं के लिये, -पितृलोक से हटाकर तुझे देव लोक में पहुंचा देवे ॥ “सत्वैतेभ्यः परिददत् पितृभ्यः ” यह तीसरा पाद संशय युक्त है । क्यों ? 'पूषा पुरस्तात् ” पूषा पहिले ( पूर्वार्द्ध में ) कहा गया है, उसीका ' सः ' पदसे यहां अनु- स्मरण है । यह एक मत हैं । इसके अनुसार मन्त्र में व्याख्या दिखाई जा चुकी है । “ अग्निरुपरिष्टात्० ” अग्नि आगे ( चतुर्थपाद में ) कहा गया है, उसी का ' सः ' पदसे कथन है । इस मत में तीसरे और चौथे पाद को यों अर्थ होता है-'सः' वह 'अग्निः'

हिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ७ अ० ३ पा० २ खं० अग्नि 'एतेभ्यः पितृभ्यः' इन पितरों से “सुविदत्रियेभ्यः देवेभ्यः परिददत् ” धनवान् देवताओं के लिये देदेवे, किन्तु पितरों ( प्रेतों ) के लिये नहीं ॥ आदित्य 'गोपा' क्यों ? “ एष हि सर्वेषां भूतानां गोपायिता” जिससे कि-यह सब भूतों का गोपायिता ( रक्षक ) है । 'सुविदत्र' क्या ? धन होता है । कैसे ? प्राप्ति अर्थ में एक उपसर्ग ( सु ) सहित 'विद्' ( तु० उ० ) से । अथवा दो उप- सर्ग ( सु-वि ) सहित दान अर्थ में 'दा' ( जु० उ० ) धातु से हैं । क्योंकि-वह सुन्दर प्रकार से विशेष करके दिया जाता है । [ यह 'सुविदत्र' ( धन ) जिनके होता है, वे ' सुविदत्रिय ' कहाते हैं । ] ॥ २ ( ६ ) ॥ व्याख्या । इस पाद के प्रथम और द्वितीय खण्ड में अग्नि का भक्ति साहचर्य दिखाया गया है, कि-उसके सम्बन्धी कौन २ पदार्थ हैं, जो अग्नि की स्तुतिमें मन्त्रों में प्रायः आते हैं । लोक, सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, स्त्रियं और कर्म ये सब स्पष्ट हैं । संस्तव से प्रयोजन ऐसी ऋचासे है, जिस में किसी दूसरे देवता के साथ अग्नि की स्तुति हो, जब कि- वह ऋचा हविःमें विनियोग न कीगई हो । यदि हविः में विनियुक्त हो, तो वह साध स्तुति ( संस्तव ) वाली भी क्यों नहो, हविः की ही समझी जावेगी । जैसे अग्नि के इन्द्र, सोम आदि देव संस्तविक बताए हैं, इन में “ अग्ने इन्द्रश्च दाशुषो

हिन्दी निरुक्त ( ४८ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० दुरोणे० " [ ऋ० सं० ३, १,२५, ४ ] यह ऋचा इन्द्र के साथ अग्नि के संस्तव की है। "अग्नीषोमाविमं सुमे०" [ ऋ० सं० १,६, २८, १ ] यह ऋचा सोमके साथ अग्नि की स्तुति की है। “आग्नावैष्णवं हविः "। यह भी देवता का एक स्वभाव है। अग्नि देव विष्णुदेव के साथ हविः के भागी होते हैं- "अग्नाविष्णू सजोषसा वर्द्धन्तु वां गिरः" इस ऋचा का वामदेव ऋषि, गायत्री छन्दः, और आग्ना वैष्णव (अग्नि विष्णु के) हविः में विनियोग है, इस ऋचा में यद्यपि विष्णु के साथ अग्नि की स्तुति है, किन्तु इस का हविः में विनियोग है, इस से यह संस्तविकी नहीं है, हविः की ही है। “आग्नापौष्णं हवि ! ०" पूषा के साथ भी अग्नि का हविः ही है, संस्तव नहीं। वह ऋचा "पूषात्वेतश्च्या- वयतु०" (ऋ०सं० १, ६, २३, ३) यह है। इस एक ही ऋचामें अग्नि और पूषा दोनों की स्तुति है,परन्तु भिन्न २ वाक्यों में है और उनका कार्य भी भिन्न २ ही है। अर्थात्- पूषा मृत को इस लोक से अलग करता है, और अग्नि उसे देव लोक में पहुंचाता है यही पूर्व हविः से इस हविः में विलक्षणता है। वहां अग्नि और विष्णु दोनों का एक संबोधन और वाणी की वृद्धि रूप एक कार्य है॥ २ (६) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) अथैतानि इन्द्रभक्तीनि- अन्तरिक्ष-

लोको, माध्यन्दिनं सवनं, ग्रीष्मः, त्रिष्टुप्, पञ्चदश- स्तोमः, बृहतसाम, ये च देवगणाः समाम्नाता मध्यमे स्थाने, याश्च स्त्रियः, अथास्य कर्म-रसानुप्रदानं, वृत्र- वधः, याच काच बलकृतिः, -इन्द्रकर्म एवतत्। अथा- स्य संस्तविका देवाः अग्निः, सोमः, वरुणः, पूषा, बृह- स्पतिः, ब्रह्मणस्पति, पर्वतः, कुत्सः विष्णुः, वायुः। अथापि मित्रो वरुणेन संस्तूयते, पूष्णा रुद्रेण च सोमः, अग्निना च पूषा, वातेन च पर्जन्यः ॥३(१०)॥ अर्थ :- अब ये इन्द्रकी भक्ति (भाग) हैं- अन्तरिक्ष लोक, माध्यन्दिन सवन, ग्रीष्म ऋतु, त्रिष्टुप् छन्दः, पञ्चदश स्तोम, बृहत् साम, और जो देवगण मध्यम स्थान पे समाम्नान (परिगणन) किये हैं, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म- जल बरसना, वृत्रका वध, और जो कोई बलकृति (बलकर्म) वह इन्द्रका ही कर्म है। अब इसके संस्तविक देव-अग्नि, सोम, वरुण, पूषा, बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, पर्वत, कुत्स, विष्णु, वायु, हैं। और भी मित्र वरुण के साथ स्तुति किया जाता है, पूषा और रुद्र के साथ सोम, और अग्नि के साथ पूषा और वात के साथ पर्जन्य स्तुति किया जाता है ॥३ (१०)॥ व्याख्या यह इन्द्र भक्ति का खण्ड है। इस में और देवता का प्रसंग न आना चाहिये, तथापि मित्र आदि देवताओं के संस्तविक देवता बताये हैं, यह याज्ञक मत के अनुसार दिखाये हैं, । नैरुक्तों के मत में तीन देवताओं के अतिरिक्त अन्य देवता नहीं है और न किसी का संस्तविक देवता ही है सुतराम् व्युत्पत्ति के लिये मतान्तर दिखाया गया है ॥३(१०)॥ (खं० ४) (निरु०-) अथैतानि आदित्यभक्तीनि-असौ लोकः, तृतीयसवनं, वर्षा, जगती, सप्तदशस्तोमः, वैरूपंसाम,

हिन्दी निरुक्त ( ५० ) ७ अ० ३ पा० ५ खं० येच देवगणाः समाम्नाताः उत्तमे स्थाने, याश्च स्त्रियः। अथास्य कर्म-रसादानं रश्मिभिश्च रसधारणं, यच्च किञ्चित्प्रबर्हितम्,-आदित्यकर्मैव तत्। चन्द्रमसा, वायुना संवत्सरेण इति संस्तवः ॥ ४ ॥ अर्थ:- अब ये आदित्य के भक्ति (भाग) हैं— वोह (तीसरा) लोक, तीसरा सवन, वर्षा ऋतु, जगती छन्दः, सप्तदशस्तोम, वैरूप साम, और जो देवगण उत्तम स्थान में समाम्नान किये है, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म है— रस का आदान (लेना) रश्मियों (किरणों) से धारण करना, और जो कुछ ⁜ प्रबर्हित (गुप्त अर्थ) वह सब आदित्य का ही कर्म है। चन्द्रमा से, वायु से, संवत्सर से संस्तव है ॥४॥ ( खं० ५ ) (निरु०-) एतेष्वेव स्थानव्यूहेषु ऋतुच्छन्दः स्तोम- पृष्ठस्य भक्तिशेषम् अनुकल्पयात्-शरद् अनुष्टुब्, एकविंशस्तोमः, वैराजं साम, इतिपृथिव्यायतनानि। हेमन्तः, पङ्क्तिः, त्रिणवस्तोमः, शाक्करं साम,- इति अन्तरिक्षायतनानि। शिशिरः, अतिच्छन्दाः त्रयस्त्रिंशस्तोमः, रैवतं साम-इति द्युभक्तीनि।५(११)। अर्थ :- इन्हीं (पृथिवी आदि) स्थानों के वर्गों में (शेष-) ऋतु, छन्दः, स्तोम और पृष्ठ (साम) का भक्ति शेष (भागशेष) समझना या मानना। (जैसे-) शरद् ऋतु अनुष्टुप् छन्दः, एक- विंशस्तोम, वैराजसाम, ये पृथिवी स्थान के या अग्नि के भक्ति हैं। हेमन्त ऋतु, पङ्क्ति छन्दः, त्रिणवस्तोम, और शाक्कर साम, ये अन्तरिक्ष स्थान के या इन्द्रके भक्ति हैं। शिशिर ऋतु, अतिच्छन्दः, त्रयस्त्रिंश स्तोम, और रैवत साम, ये द्युलोक की भक्ति हैं॥ ५ (११) ॥ 'अनभिव्यक्तिविशिष्टौ वाक्यार्थः प्रवर्हितम्' (भग०)

हिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं० ( खं० ६ ) [निरु०] ‘मन्त्राः’ मननात् । ‘छन्दांसि’ छादनात् । ‘यजुः’ यजतेः । ‘साम’ संमितम्-ऋचा, अस्यतेर्वा (स्य- तेर्वा ऋचा समं मेने इति नैदानाः । ‘गायत्री’ गायतेः स्तुतिकर्मणः, त्रि- गमना, विपरीता, गायतो मुखाद्— उदपतत्-इति च ब्राह्मणम् । अर्थ :- ‘मन्त्र’ क्यों ? मनन से । [ क्योंकि-उनसे अध्या- त्म, अधिदैव, अधियज्ञ आदि अर्थ को मनन (ध्यान) किया जाता है । ] ‘छन्दस्’ (छन्द) क्यों ? छादन (ढांपने) से । [ क्योंकि- मृत्यु से डरते हुये देवताओं ने इन से अपने को ढांपा था, यही इन छन्दों का छन्दपना है, यह ब्राह्मणश्रुति से जाना जाता है । ] ‘यजुः’ क्यों ? पूजा अर्थ में ‘यज’ (स्वा०उ०) धातु से है। [ क्यों कि उससे विशेष करके यजन किया जाता है । ] ‘साम’ क्यों? ‘सम्मितम् ऋचा’ ऋचा के समान है-जितनी ऋचा होती है-उतना ही परिमाण से होता है । अथवा क्षेपण (फेंकना) अर्थ में ‘अस्’ (दि०प०) धातु से है । [ क्यों कि-वह ऋचा में फेंका हुआ ( डाला हुआ ) जैसा होता है- ऋचा ही गान की हुई साम हो जाता है । ] अथवा ‘सो’