निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपि वा पुरुषविधानामेव सतां कर्मात्मानः एते स्युः, यथा यज्ञो यजमानस्य ॥ एष च आख्यानसमयः ॥ ३ [७] ॥ इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ७, २ ॥ ( खं० २ ) ( देवताओं के आकार की चिन्ता । ) अर्थः- “ अथ० ” यहां से देवताओं के आकार का चिन्तन होता है । “ पुरुषविधाः० ” पुरुष सरीखे ( देवता ) हैं-देवता- ओं का आकार पुरुषों जैसा है। यह एक ( मत है ) । ( इस मत की युक्तिएं ) (क) “ चेतनावद्वद्०” क्योंकि-चेतनावानों की जैसी स्तुतिएँ होती हैं। (ख) “ तथा० ” वैसे ही अभिधान या संवाद हैं- संवाद सूक्तों में मनुष्यों के समान प्रश्न उत्तर देखे जाते हैं। (ग) “ अथापि० ” और भी पुरुषों के जैसे अङ्गों से स्तुति किये जाते हैं ( जैसे-) “ ऋष्वात० ” हे इन्द्र ! तुम महान् के शत्रुओं के नाश करने वाले दोनों भुजाओं की हम उपासना करते रहें । “ यत्संगृभ्णा० ” हे मघवन् ! इन्द्र ! जो तू (अपार द्यावापृथिवीओं को ) पकड़लेता है, तेरी मुष्टि (मुट्ठी ) बड़ी है । [ अ० ६, पा० १ खं० २ ]