निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० (घ) "अथाऽपि०" और भी पुरुषों के द्रव्यों जैसे द्रव्यों के संयोगों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)। जैसे- "आद्वाभ्याम्०" हे इन्द्र ! दो ही घोड़ों से आ-यदि तेरे पास दो ही घोड़े हों तो उन्हीं को रथ में जोड़ कर हमारे यज्ञ में आ। "कल्याणीर्जाया०" तेरे घर में कल्याणी (शुभगुणवती) सुन्दर भार्या है। (ङ) "अथापि०" और भी पुरुष सरीखे कर्मों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)। (जैसे-) "अद्धीन्द्र०" हे इन्द्र ! तू प्रस्तुत (सोम) को खा और पी। "आश्रुत्कर्ण ! ०" हे सुन्दर कान वाले² (हमारे) आवाहन को सुन। (खं० ३) (दूसरा मत) "अपुरुषविधाः०" पुरुषों से भिन्न प्रकार (आकार) के देवता हैं (यह और (मत) है। (इस मतकी युक्ति) "अपि तु यद्०" क्योंकि जो कुछ (देवताओं का) देखा जाता है, वह अपुरुष सरीखा (पुरुषों से भिन्न प्रकार का) है। जैसे अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमाः। (प्रथम मत का खण्डन) (क) "यथो एतत्०" जो कि यह (कहा)- "चेतना-