भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 818

हिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ७ अ० ३ पा० २ खं० अग्नि 'एतेभ्यः पितृभ्यः' इन पितरों से “सुविदत्रियेभ्यः देवेभ्यः परिददत् ” धनवान् देवताओं के लिये देदेवे, किन्तु पितरों ( प्रेतों ) के लिये नहीं ॥ आदित्य 'गोपा' क्यों ? “ एष हि सर्वेषां भूतानां गोपायिता” जिससे कि-यह सब भूतों का गोपायिता ( रक्षक ) है । 'सुविदत्र' क्या ? धन होता है । कैसे ? प्राप्ति अर्थ में एक उपसर्ग ( सु ) सहित 'विद्' ( तु० उ० ) से । अथवा दो उप- सर्ग ( सु-वि ) सहित दान अर्थ में 'दा' ( जु० उ० ) धातु से हैं । क्योंकि-वह सुन्दर प्रकार से विशेष करके दिया जाता है । [ यह 'सुविदत्र' ( धन ) जिनके होता है, वे ' सुविदत्रिय ' कहाते हैं । ] ॥ २ ( ६ ) ॥ व्याख्या । इस पाद के प्रथम और द्वितीय खण्ड में अग्नि का भक्ति साहचर्य दिखाया गया है, कि-उसके सम्बन्धी कौन २ पदार्थ हैं, जो अग्नि की स्तुतिमें मन्त्रों में प्रायः आते हैं । लोक, सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, स्त्रियं और कर्म ये सब स्पष्ट हैं । संस्तव से प्रयोजन ऐसी ऋचासे है, जिस में किसी दूसरे देवता के साथ अग्नि की स्तुति हो, जब कि- वह ऋचा हविःमें विनियोग न कीगई हो । यदि हविः में विनियुक्त हो, तो वह साध स्तुति ( संस्तव ) वाली भी क्यों नहो, हविः की ही समझी जावेगी । जैसे अग्नि के इन्द्र, सोम आदि देव संस्तविक बताए हैं, इन में “ अग्ने इन्द्रश्च दाशुषो