निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तं ( ४६ ) ७ अ० ३ पा० २ खंड कोई ऐसा विषय नहीं जिसे वह अच्छी तरह न समझ सकें इसी से उस के प्रबन्ध में तुझे जाने से लाभ ही हो सकता है, हानि नहीं, 'अनष्टपशुः' इसी से उसका पशु नष्ट नहीं होता उसकी पूजा बन्ध नहीं होती ( जो अपने काम को भले प्रकार जानने वाला होता है, और अपने कर्तव्य को ठीक पालन करता रहता है, उसका काम कभी बन्ध नहीं होता ।) ' भुवनस्य गोपाः ' और प्राणिमात्रका गोपायिता = रक्षक है, 'सः' वह ऐसा पूषा देव 'त्वा' तुझे ( यहाँ से लेजाकर ) 'एतेभ्यः' ( चन्द्रमण्डलोपान्तंवासिभ्यः) इन चन्द्रमण्डल के पास रहने वाले 'पितृभ्यः' पितरों के लिये 'परिददत्' (परि- ददातु ) देदेवे । [ सो कहा भी है- “दक्षिणायनात् पितृ- लोकम् ” सूर्य के दक्षिणायन कालमें पितृ लोक को जाता है । ] 'अग्निः' और अग्नि देव भी 'सुविद्रियेभ्यः' धनवाले 'देवेभ्यः' देवताओं के लिये, -पितृलोक से हटाकर तुझे देव लोक में पहुंचा देवे ॥ “सत्वैतेभ्यः परिददत् पितृभ्यः ” यह तीसरा पाद संशय युक्त है । क्यों ? 'पूषा पुरस्तात् ” पूषा पहिले ( पूर्वार्द्ध में ) कहा गया है, उसीका ' सः ' पदसे यहां अनु- स्मरण है । यह एक मत हैं । इसके अनुसार मन्त्र में व्याख्या दिखाई जा चुकी है । “ अग्निरुपरिष्टात्० ” अग्नि आगे ( चतुर्थपाद में ) कहा गया है, उसी का ' सः ' पदसे कथन है । इस मत में तीसरे और चौथे पाद को यों अर्थ होता है-'सः' वह 'अग्निः'