निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५० ) ७ अ० ३ पा० ५ खं० येच देवगणाः समाम्नाताः उत्तमे स्थाने, याश्च स्त्रियः। अथास्य कर्म-रसादानं रश्मिभिश्च रसधारणं, यच्च किञ्चित्प्रबर्हितम्,-आदित्यकर्मैव तत्। चन्द्रमसा, वायुना संवत्सरेण इति संस्तवः ॥ ४ ॥ अर्थ:- अब ये आदित्य के भक्ति (भाग) हैं— वोह (तीसरा) लोक, तीसरा सवन, वर्षा ऋतु, जगती छन्दः, सप्तदशस्तोम, वैरूप साम, और जो देवगण उत्तम स्थान में समाम्नान किये है, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म है— रस का आदान (लेना) रश्मियों (किरणों) से धारण करना, और जो कुछ ⁜ प्रबर्हित (गुप्त अर्थ) वह सब आदित्य का ही कर्म है। चन्द्रमा से, वायु से, संवत्सर से संस्तव है ॥४॥ ( खं० ५ ) (निरु०-) एतेष्वेव स्थानव्यूहेषु ऋतुच्छन्दः स्तोम- पृष्ठस्य भक्तिशेषम् अनुकल्पयात्-शरद् अनुष्टुब्, एकविंशस्तोमः, वैराजं साम, इतिपृथिव्यायतनानि। हेमन्तः, पङ्क्तिः, त्रिणवस्तोमः, शाक्करं साम,- इति अन्तरिक्षायतनानि। शिशिरः, अतिच्छन्दाः त्रयस्त्रिंशस्तोमः, रैवतं साम-इति द्युभक्तीनि।५(११)। अर्थ :- इन्हीं (पृथिवी आदि) स्थानों के वर्गों में (शेष-) ऋतु, छन्दः, स्तोम और पृष्ठ (साम) का भक्ति शेष (भागशेष) समझना या मानना। (जैसे-) शरद् ऋतु अनुष्टुप् छन्दः, एक- विंशस्तोम, वैराजसाम, ये पृथिवी स्थान के या अग्नि के भक्ति हैं। हेमन्त ऋतु, पङ्क्ति छन्दः, त्रिणवस्तोम, और शाक्कर साम, ये अन्तरिक्ष स्थान के या इन्द्रके भक्ति हैं। शिशिर ऋतु, अतिच्छन्दः, त्रयस्त्रिंश स्तोम, और रैवत साम, ये द्युलोक की भक्ति हैं॥ ५ (११) ॥ 'अनभिव्यक्तिविशिष्टौ वाक्यार्थः प्रवर्हितम्' (भग०)