निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं० ( खं० ६ ) [निरु०] ‘मन्त्राः’ मननात् । ‘छन्दांसि’ छादनात् । ‘यजुः’ यजतेः । ‘साम’ संमितम्-ऋचा, अस्यतेर्वा (स्य- तेर्वा ऋचा समं मेने इति नैदानाः । ‘गायत्री’ गायतेः स्तुतिकर्मणः, त्रि- गमना, विपरीता, गायतो मुखाद्— उदपतत्-इति च ब्राह्मणम् । अर्थ :- ‘मन्त्र’ क्यों ? मनन से । [ क्योंकि-उनसे अध्या- त्म, अधिदैव, अधियज्ञ आदि अर्थ को मनन (ध्यान) किया जाता है । ] ‘छन्दस्’ (छन्द) क्यों ? छादन (ढांपने) से । [ क्योंकि- मृत्यु से डरते हुये देवताओं ने इन से अपने को ढांपा था, यही इन छन्दों का छन्दपना है, यह ब्राह्मणश्रुति से जाना जाता है । ] ‘यजुः’ क्यों ? पूजा अर्थ में ‘यज’ (स्वा०उ०) धातु से है। [ क्यों कि उससे विशेष करके यजन किया जाता है । ] ‘साम’ क्यों? ‘सम्मितम् ऋचा’ ऋचा के समान है-जितनी ऋचा होती है-उतना ही परिमाण से होता है । अथवा क्षेपण (फेंकना) अर्थ में ‘अस्’ (दि०प०) धातु से है । [ क्यों कि-वह ऋचा में फेंका हुआ ( डाला हुआ ) जैसा होता है- ऋचा ही गान की हुई साम हो जाता है । ] अथवा ‘सो’