निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० अन्तकर्मणि (दि०प०) धातु से है। [क्योंकि-वह अन्न का कर्म होता है, पहिले संहिता (पाठ) फिर पद ( पाठ ) फिर साम (पाठ) ।] अथवा “ऋचा समं मेने” ऋचाके समान माना गया, इस से 'साम' है। ऐसा “निदान” ग्रन्थ के जानने वाले मानते हैं । 'गायत्री' कैसे ? स्तुति अर्थ में 'गै' (भ्वा० प०) धातु से है। [क्योंकि-उससे देवता स्तुति किये जाते हैं।] अथवा 'त्रिगमना' तीन प्रकार की गति वाली होने से 'गायत्री' है। “गाते हुये ब्रह्मा के मुख से उड़ी” यह ब्राह्मण है ॥६॥ (खं० ७) (निरु०-) 'उष्णिक्' उत्स्नाता भवति । स्निह्यते र्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । उष्णीषिणीवा-इति औपमिकम् । 'उष्णीषम्' स्नायतेः । 'ककुप्' ककुभिनी भवति । 'ककुप्' च कुब्जश्च कुजतेर्वा, उब्जतेर्वा । 'अनुष्टुप्' अनुष्टोभनात् । "गायत्रीमेव त्रिप- दां सतीं चतुर्थेन पादेन अनुष्टोभति-इति च ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥ अर्थः-'उष्णिक्' क्यों ? वह उत्स्नाता होती है-गायत्री से चार अक्षरों से अधिक लिपटी हुई होती है। अथवा कान्ति अर्थ में 'स्निह्' (दि०प०) धातु से है। (क्योंकि-यह देवता-