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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० अन्तकर्मणि (दि०प०) धातु से है। [क्योंकि-वह अन्न का कर्म होता है, पहिले संहिता (पाठ) फिर पद ( पाठ ) फिर साम (पाठ) ।] अथवा “ऋचा समं मेने” ऋचाके समान माना गया, इस से 'साम' है। ऐसा “निदान” ग्रन्थ के जानने वाले मानते हैं । 'गायत्री' कैसे ? स्तुति अर्थ में 'गै' (भ्वा० प०) धातु से है। [क्योंकि-उससे देवता स्तुति किये जाते हैं।] अथवा 'त्रिगमना' तीन प्रकार की गति वाली होने से 'गायत्री' है। “गाते हुये ब्रह्मा के मुख से उड़ी” यह ब्राह्मण है ॥६॥ (खं० ७) (निरु०-) 'उष्णिक्' उत्स्नाता भवति । स्निह्यते र्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । उष्णीषिणीवा-इति औपमिकम् । 'उष्णीषम्' स्नायतेः । 'ककुप्' ककुभिनी भवति । 'ककुप्' च कुब्जश्च कुजतेर्वा, उब्जतेर्वा । 'अनुष्टुप्' अनुष्टोभनात् । "गायत्रीमेव त्रिप- दां सतीं चतुर्थेन पादेन अनुष्टोभति-इति च ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥ अर्थः-'उष्णिक्' क्यों ? वह उत्स्नाता होती है-गायत्री से चार अक्षरों से अधिक लिपटी हुई होती है। अथवा कान्ति अर्थ में 'स्निह्' (दि०प०) धातु से है। (क्योंकि-यह देवता-

हिन्दी निरुक्त ( ५४ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० ओं को (स्निग्ध प्यारा) छन्द है) अथवा यह उष्णीषिणी (पगड़ी वाली) जैसी होती है, इससे 'उष्णिक्' है। यह औपमिक (उपमा के साथ) नाम है। 'उष्णीष' (पगड़ी) कैसे ? शुद्धि अर्थ में 'स्नै' (भ्वा० प०) धातु से है । (क्योंकि- वह शुद्ध (धोई हुई = सफेद होती है) । 'ककुप्' (छन्द) क्यों ? 'ककुभिनी इव भवति' थूही वाली जैसी होती है-पूर्वोक्त सप्ताक्षर पाद वाली उष्णिक् के मध्य में जगती छन्द का बारह (१२) अक्षरों का पाद बीच में गिरा हुआ रहता है, इससे वह बीच में मोटी हो जाने से थूही वाली जैसी प्रतीत होती है। (यह नाम भी ककुभ (थूही) की उपमा से बना है)। 'ककुभ्' और 'कुब्ज' शब्द दोनों कौटिल्य अर्थ में 'कुज' (तु० प०) धातुसे हैं। (क्योंकि-वे (थूही और कुबड़ा) टेढ़े होते हैं।) अथवा न्यग्भाव या झुकना अर्थ में 'उब्ज' (भ्वा०प०) धातु से हैं। (क्योंकि-वे झुके हुये जैसे होते हैं।) 'अनुष्टुभ्' (अनुष्टुप् छन्द) क्यों ? अनुष्टोभन (थांभने) से। (क्योंकि) गायत्री को ही त्रिपदा (तीन पाद वाली) होती हुई को चौथे पाद से थांभलेती है = ठहरालेती है- गायत्री छन्द चौबीस (२४) अक्षरों का होता है, उसमें अनुष्टुप् के आठ (८) अक्षरों के तीन ही पाद बनते हैं, उसी में आठ (८) अक्षरों का एक पाद बढ़ने से बत्तीस अक्षरों का अनुष्टुप् छन्द होता है। इस गणना से तीसरे पाद पर गायत्री छन्द गिरजाता है और अनुष्टुप् छन्द उसमें चौथा

हिन्दी निरुक्त    ( ५५ )    ७ अ० ३ पा० ८ खं० पाद पूरा करके मानों उसे थांभलेता है । इसी से यह अनुष्टुभ् है, यह ब्राह्मण है ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) ( निरु०- ) ' बृहती ' परिवर्हणात् । 'पङ्क्तिः' पञ्चपदा । 'त्रिष्टुप्' स्तोभत्युत्तरपदा । का तु त्रिता स्यात् ? तीर्णतमं छन्दः । त्रिवृद् वज्रः, तस्य स्तोभाति इति वा । “यत् त्रिरस्तोभत् तत् त्रिष्टुभ स्त्रिष्टु- प्वम्-” इति विज्ञायते ॥ ८ ( १२ ) ॥ अर्थः- 'बृहती' क्यों ? परिवर्हण ( वृद्धि ) से । ( क्योंकि वह अनुष्टुप् छन्द की अपेक्षा से चार अक्षरों से बढी हुई होती है । ) 'पङ्क्ति' ( छन्द ) क्यों ? ' पञ्चपदा ' । वह पांचपाद वाली होती है-क्योंकि उसके चारों पाद दश २ अक्षरों के होते हैं-कुल चालीस ( ४० ) अक्षर होते हैं, उनमें अष्टाक्षरपाद अनुष्टुप् के पांच पाद बनजाते हैं, इसी से वह पञ्चपदा हो कर ' पङ्क्ति' होगई ! 'त्रिष्टुप्' कैसे ? “ स्तोभत्युत्तरो ” इसका ' स्तुभ् ' ( स्वा० प० ) उत्तर पद है-पहिला पद ' त्रि ' और दूसरा 'स्तुभ् ' धातु । किन्तु त्रिता ( त्रित्व ) क्या । “ तीर्णतमं छन्दः ” बहुत ही प्रशंसा किया गया छन्द । क्योंकि-यह तीर्णतम = स्तुततम है और गायत्री छन्द को स्तोभन करता

हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं० है (ठहरता है) इस से 'त्रिष्टुप्' है । अथवा 'त्रिवृद्' तीन धारवाला वज्र होता है, उसको स्तोभन (स्तुति) करता है, इससे 'त्रिष्टुप्' है । “यत् त्रि०” 'जिससे कि-इसने तीन वार स्तुति की है, वह त्रिष्टुभ्‌का त्रिष्टुभ् पना है' यह ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है ॥ ८ (१९) ॥ ( खं० ६ ) ( निरु०- ) 'जगती' गततमं छन्दः । जल- चरगति र्वा । “ जल्गल्यमानोऽसृजत ” इति च ब्राह्मणम् । 'विराट्' विराजनाद् वा । विराधनाद् वा । विप्रापणाद् वा । विराजनात् सम्पूर्णाक्षरा । विराधनाद् ऊनाक्षरा । विप्रापणाद् अधिकाक्षरा । 'पिपीलिकमध्या'-इति औपमिकम् । 'पिपीलिका' पेलतेर्गतिकर्मणः ॥ ९ ॥ अर्थ:-'जगती' क्या ? गततम (बिलकुल गयां हुआ) छन्द । [क्यों ? वह सब छन्दों से अन्त का छन्द है, इससे पर छन्द नहीं, किन्तु अतिच्छन्द हैं ।) अथवा जलचरगति होने से 'जगती' है । (क्योंकि-उसका प्रस्तार जलकी लहरियों जैसा होता है । ] “ जल्गल्यमानो० ” प्रजापति ने इसे जल- गल्यमान ( क्षीण हर्ष) होते हुए रचा है या देखा है (क्योंकि- छन्द नित्य हैं, उनकी रचना का संभव नहीं इससे 'सृज' का दर्शन अर्थ ही संभव होता हैं ।) यह ब्राह्मण है :

हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० 'विराट्' क्यों ? विराजन ( विशेष शोभन ) होने से, अथवा विराधन ( विकल ) होने से । अथवा विपापणा (बढने- से) । सम्पूर्ण अक्षर वाली होने से विराजमान है । अल्प अक्षर वाली होनेसे विकल है । अधिकाक्षर होने से विप्लुता उछली हुई जैसी । 'पिपीलिकमध्या' यह नाम उपमांसे है। पिपीलिका (चींटी) के समान आकार वाली होती है । 'पिपीलिका' कैसे ? गति अर्थ में पेल, ( भ्वा. प० ( धातुसे है । [क्योंकि- वह चलती ही रहती है ।]॥ ९ ॥ (खं० १०) (निरु०-) इति- इमा देवता अनुक्रान्ताः- सूक्तभाजः, हविर्भाजः, ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः। का- श्चिन्निपातभाजः । अथोत अभिधानैः संयुज्य हविश्चो दयति-इन्द्राय वृत्रघ्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे-इति । तान्यपि एके समामनन्ति । भूयांसि तु समा- म्नानात् । यत्तु संविज्जानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत् समामने । अथोत कर्मभिर्ऋषिर्देवताः स्तौति-वृत्रहा, पुरन्दर इति, तान्यपि एके समामनन्ति । भूयां सि तु समाम्नानात् । व्यञ्जनमात्रं तु तत् तस्या-

हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ७ अ० ३ पा० १० खं०

भिधानस्य भवति । यथा-ब्राह्मणाय बुभुक्षिताय ओदनं देहि, स्नाताय अनुलेपनं, पिपासते पानी- यम्- इति ॥ १० ( १३ ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३॥ अर्थ:- “इति इमा०” । इस प्रकार ये देवता अनुक्रम से कहे गए-जिनमें कोई सूक्तभाक् = सूक्तों को भजने वाले-सूक्तों में जिनकी प्राधान्य से स्तुति होती है, परन्तु हविः उनको नहीं दी जाती, कोई हविर्भाक् = हविः को भजने वाले = जिनको हविः दी जाती है, या देना विहित है, “ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः” और बहुत से ऋचाओं के भजने वाले हैं-जिनकी एक २ ऋचा में (या आधी २ ऋचा में या चौथाई १ ऋचामें ) स्तुति होती है, किन्तु सूक्तों में नहीं ऐसे बहुत ही देवता हैं । ( सूक्त अनेक मन्त्रों का समूह होता है । ) । और कुछ देवता निपात के भजन करने वाले हैं-- उनकी कहीं सूक्त, मन्त्र, या आधी ऋचा में प्राधान्य से स्तुति नहीं वे सदा दूसरे प्रधान देवताओं की स्तुति में गौण रूप से आते हैं, या उनके मन्त्रों में उनके साथ स्तुति किये जाते हैं ॥ समाम्नाय के समाम्नान (संग्रह) के विषयमें “अथोत अभिधानैः” और भी अभिधानों के साथ विशेषण शब्दों को संयुक्त करके विधिशास्त्र ) हविः का विधान करता है- “इन्द्राय वृत्रघ्ने” (एकादशकपालं निर्वपेत् ) वृत्र के हनन करने वाले इन्द्र के लिये ग्यारह कपालों में पकाये हुए पुरोडाश को देवे । इन्द्राय वृत्रतुरे”

वृत्रतुर् (वृत्र को भगाने वाले) इन्द्र के लिये "इन्द्राय— अंहोमुचे" पाप को छुड़ाने वाले इन्द्र के लिये ( एकादश- कपालं निर्वपेत् ) ग्यारह कपालों के पुरोडाश को देवे । "तान्यपि०" उनको भी कोई ( आचार्य ) समाम्नान करते हैं- निघण्टु शास्त्र में पढ़ते हैं- देवताओं के इन्द्र आदि प्रधान नामों के समान उनके विशेषण 'वृत्रहन्' 'वृत्रतुर्' और 'अंहोमुच्', आदि शब्दों को भी निघण्टु में संग्रह करते हैं ! "भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समाम्नान करने से बहुत नाम हो जावेंगे ? "यत्तत्संविज्ञानभूतं" मैं तो जो संविज्ञानभूत = प्रकृति, प्रत्यय आदि संस्कारों से बनाहुआ और प्रधान्य से स्तुति वाला नाम है, उसे समाम्नान करता हूं । "अथोत०" और भी ऋषि कर्मों से देवताओं की स्तुति करता है-'वृत्रहा' वृत्र को मारने वाला, 'पुरन्दर' पुर दैत्य को मारने वाला, (इत्यादि ।) उनको भी (कर्मनामों = गौण नामों को भी) कोई आचार्य समाम्नान करते हैं । "भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समा- म्नान से बहुत हो जावेंगे । "व्यञ्जनमात्रन्तु०" वह तो विशेषणमात्र है-उस (प्रधान) नाम का । जैसे बुभुक्षित (भूखे) ब्राह्मण के लिये भात दे, नहाए के लिये अनुलेपन (चन्दन) प्यासे के लिये पानी, यह, (यहां 'ब्राह्मण' इस प्रधान नाम के साथ 'बुभुक्षित' आदि नाम विशेषण हैं ।) ॥ १० (१३) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ३ पा० १० खं० व्याख्या । सप्तमाध्याय के आरम्भ से देवतातत्त्व के ही सम्बन्धमें विशेष २ अर्थों का निर्णय होता आया है । जैसे पहिले देव- ता का लक्षण कि किस पहिचान से मन्त्र में देवता समझा जावेगा । फिर जिन मन्त्रों में देवता ज्ञातव्य है उन मन्त्रों के परोक्ष, प्रत्यक्ष और आध्यात्मिक भेद बताए गए हैं, उन का भी प्रयोजन देवता का परिज्ञान ही है । क्योंकि भिन्न २ स्वभाव वाली ऋचाओं में भिन्न २ प्रकार से देवता रहता है, इससे उनके स्वभाव जाने बिना देवता परिज्ञानमें संकट उपस्थित हो सकता है। इसी प्रसंग में हीन लक्षण मन्त्र भी दिखाए, जिनमें कोई स्तुतिहीन है, कोई कामनाहीन है, कोई शापरूप है, और कोई शपथरूप है, इत्यादि । फिर अनादिष्ट मन्त्र अनेक मत भेदोंसे अनेक प्रकार के दिखाए हैं- जिनमें कोई देवता के चिन्ह से रहित होकर यज्ञ में सम्बन्ध करता है, कोई यज्ञाङ्ग में सम्बन्ध करता है, कोई दोनों में सम्बन्ध नहीं करता, उनमें यज्ञ देवता, यज्ञाङ्ग देवता, यज्ञ से अन्यत्र याज्ञिकों के मत में 'प्रजापति' देवता, नैरुक्तों के मत में 'नराशंस' देवता अथवा इच्छित देवता, अथवा अधि- कृत देवता, अथवा विश्वदेवता, अथवा यज्ञ देवता (आदित्य देवता) अथवा अग्नि देवता इत्यादि रूप से निर्णय किया है फिर अदेवताओं को देवताओं के समान स्तुति का आक्षेप और उसका देवता के माहाभाग्य आदि हेतुओं से प्रतिसमा- धान, फिर देवताओं की संख्या के सम्बन्ध में नैरुक्तों के मत में त्रित्व और याजकों के मत प्रतिनाम देवता का भेद (और आत्मवित् के मत में एक आत्मा देवता) स्थापन

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ३ पा० १० सं० किया, तथा “एतन्नरराष्ट्रमिव” इस दृष्टान्त से सब पक्षों की गौण मुख्य भाव से एकवाक्यता सिद्ध की है। फिर देवताओं के आकार का प्रश्न, जिसमें पुरुषाकारता, अपुरुषा- कारता, कर्मार्थ आत्मा की उभयविधता, और नित्य उभय- विधता रूपमे चार प्रकार के आकारों की मन्त्रप्रामाण्य से व्य- वस्था दी है। फिर देवताओं का नैरुक्तों के मतसे भक्तिसाहचर्य विस्तारसे निरूपण किया है। फिर 'मन्त्र' 'छन्दस्' 'यजुः' 'साम' और 'गायत्री' आदि शब्दोंके निर्वचनसे मन्त्रों के सामान्य विशेष स्वभाव दिखाये हैं फिर अब इस खण्डमें इस दैवतकाण्ड के उपोद्घात को पूरा करते हैं और जो कुछ देवता सम्बन्ध में अवशिष्ट है, संक्षेप से कहदेते हैं, इसी बात की सूचना के लिये खण्ड के आरम्भ में “इति इमाः” 'इति' शब्द दिया है। अथवा पूर्वोक्त प्रकार की सूचना के लिये यह 'इति' शब्द दिया है-जिस लक्षण जिस से, संख्या से, जिस आकार से ये देवता कहे गए हैं, वे सब देवता संक्षेपसे फिर चार प्रकार के हैं-सूक्तभाक्, हवि र्भाक्, ऋग्भाक्, और निपातभाक्। अर्थात्-इनस्वभावों को लेकर भी देवताओंका विभाग करना, ये स्वभाव भी सब के समान नहीं हैं। जो सूक्तभाक्-सूक्तों से स्तुति किये जाते हैं, उनका समूह अलग है, जो हविर्भाक् हैं, जिनको हविः दिया जाता है, वे अलग हैं, जो ऋग्भाक् (अर्द्धर्चभाग्, ऋक्पादभाक्) हैं, वे अलग हैं, किन्तु ये औरों की अपेक्षा से संख्या में बहुत अधिक हैं (जैसे धनाढ्य कम और अल्पधन अधिक होते हैं) और ऐसे ही कोई देवता ऐसे हैं, जो निपातभाक् हैं- दूसरों के स्तोत्र में गौण रूप से आते हैं। यह चौथा देवताओं का विभाग अलग

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० है। जब देवता पदार्थ का विचार करना हो, तो और देव धर्मों के साथ में इन पर भी ध्यान रखा जावे निघण्टु की रचना यास्काचार्य्य इसी उपोद्घात में समाम्नाय या निघण्टु को अपने से पूर्वस्थिति को बता कर अपने स्वीकृत या परिष्कृत निघण्टु को भी देना आवश्यक समझते हैं। जिससे यह भी सूचित हो कि उन्होंने समाम्नाय पर भाष्य लिखकर ही इस शास्त्र का उपकार नहीं किया है, बल्कि- इस के मूल शरीर को उपयुक्त और लघु भी बना दिया है। जिस के कारण अध्येताओं को इस शास्त्र का अध्ययन सुगम और अल्पकालसाध्य होगया है। भाष्यकार कहते हैं— “ अथोत अभिधानैः० तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” जहां तहां विधिवाक्यों में देवताओं के प्रधान नामोंके साथ जो विशेषण शब्द दिये हैं, उन का भी कोई आचार्य्य समाम्नान करते हैं, किन्तु वैसे शब्दों के लेने से बहुत अधिक शब्द हो जाते हैं। और भी फिर कहते हैं- “अथोत कर्मभिः०- तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” कहीं २ मन्त्रों में ऋषि कर्मों से देवता की स्तुति करता है, जैसे 'वृत्रहा' 'पुरन्दर' इत्यादि, इन शब्दोंका भी कोई आचार्य्य अपने समाम्नाय में संग्रह करते हैं, किन्तु ऐसा करने से शब्द बहुत अधिक हो जावेंगे। सुतराम् यास्क अपने निघण्टु से पहिले दो प्रकार के निघण्टुओं को देख रहे हैं, उन दोनों

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ०३ पा० १० खं० में अनावश्यक शब्दों के संग्रह से बडा गौरव होंगया था अतः उन शब्दों को निकाल कर पञ्चाध्यायी के रूप में प्रधान देवता नामों और आवश्यक नैघण्टुक तथा ऐकपदिक शब्दों का उन्होंने संग्रह किया और उसी पर यह “निरुक्त” नाम भाष्य निर्माण किया है । इस स्थल के निरुक्त को देखने से यह बात स्पष्ट होजाती है कि-जिस प्रकार व्याकरण शास्त्र को अनादि परम्परागत होने पर भी उस के ग्रन्थों की रचना समय २ पर बदलती आई है, उसी प्रकार “निघण्टु” शास्त्र की भी परम्परा है इस की भी समय २ में आचार्यों के द्वारा नई ३ रचना हुई है और अब हम जिस निघण्टु को पढ रहे हैं, वह यास्क मुनिका ही किया हुआ परिष्कृत संग्रह है । जिस का प्रमाण यह प्रकरण ही है- “यत्तु संविज्ञानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत् समामने ” अर्थात्-जो संविज्ञानभूत प्राधान्य से स्तुति युक्त नाम हो उसी को मैं समाम्नान करता हूं । इस के अतिरिक्त आरम्भ की प्रतिज्ञा भी यही बात कह रही है, कि आचार्य अपने ही समाम्नान किये हुए समाम्नाय की व्याख्या करते हैं- “समाम्नायः समाम्नातः, स व्याख्यातव्यः ” अर्थात् समाम्नाय का समाम्नान हो चुका, उसकी व्याख्या करना चाहिये । यदि समाम्नाय पहिले से प्रस्तुत होता, तौ “समा- म्नायो व्याख्यातव्यः ” समाम्नाय की व्याख्या करना

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० चाहिए, इतना ही पर्याप्त था । जैसे "अथातो धर्मजि- ज्ञासा" आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों में प्रतिज्ञा वाक्य हैं किन्तु "समाम्नायः समाम्नातः" 'समाम्नाय का समा- म्नान किया गया'—इस अनुवाद की क्या अपेक्षा थी ? सुतराम् समाम्नाय का समाम्नान स्वयम् यास्काचार्य ने ही किया है इसी से उनको ऐसा कहना उचित था । इसी की पुष्टि "यत्त संविज्ज्ञानभूतं०" यह उपरिलिखित वाक्य स्पष्ट शब्दों में कर ही रहा है। अतः यह असन्दिग्ध सिद्ध होगया कि- यह संग्रह यास्काचार्य का ही है, और का नहीं ॥ १० ( १३ ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३ ॥ ( समाप्त उपोद्घातः )

हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ४ पा० १ खं० चतुर्थः पादः । ( खं० १ ) अथ निघण्टुपञ्चमोऽध्यायः । ५ । ( अथ त्रीणि पदानि ) ॐ ॥ अग्निः ॥ १ ॥ ( निरु०- ) अथातोऽनुक्रमिष्यामः । अग्निः पृथिवीस्थानः तं प्रथमं व्याख्यास्यामः । 'अग्निः' कस्मात् ? अग्रणीर्भवति । अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते । अङ्गं नयति सन्नममानः । अक्नोपनो भवति इति स्थौलाष्ठीविः । न क्नोपयति, न स्नेह- यति । त्रिभ्य आख्यातेभ्यो जायते इति शाकपूणिः । इताद्, अक्ताद्, दग्धाद् वा नीतात् । स खलु एतेः अकारम् आदत्ते, गकारम्- अनक्तेर्वा, दहतेर्वा, नीः परः । तस्य एषा भवति ॥ १ ( १४ ) ॥ अर्थः- “अथातो०” अब यहां से अनुक्रमण करेंगे- सामान्यरूप से 'अग्नि' आदि देवपत्नी पर्यन्त सब देवताओं की व्याख्या होचुकी, अब विशेष रूप से 'अग्नि' आदि ( १५१ ) शब्दों की प्रतिपद व्याख्या होगी । 'अग्नि' ( देवता ) पृथिवी स्थान है-इस का पृथिवी

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० १ ख० ही स्थान है, किन्तु अन्तरिक्ष या द्युलोक नहीं है। [ क्यों कि-उसको कर्म का अधिकार पृथिवी लोक ही में है, जो कुछ वह करता है, पृथिवी में ही करता है। ] "तं प्रथमं०" उस (अग्नि) को पहिले व्याख्यान करेंगे-क्योंकि-इस का पृथिवी स्थान है और वह हमारे निकट तथा वही लोकों की गणना में पहिले आती है, इससे प्रथम पृथिवी स्थान अग्नि की ही व्याख्या करेंगे। [ कारण के विना प्रथम का लङ्घन नहीं किया जाता। 'अग्नि' क्यों है ? वह अग्रणी होता है-सब कामों में अपने को आगे लेजाता है-वह सब जगह ऐसा उपकार करता है, जिससे अग्र (आगा) बन जावे। अथवा यज्ञों में आगे (आहवनीय आदि स्थानों में) पहुंचाया जाता है, इस से 'अग्रणी' होता हुआ 'अग्नि' हो जाता है। "अङ्गं नयति संनममानः" झुकता हुआ ही अङ्ग को लेजाता है- जिस किसी लौकिक वैदिक कर्म में जाता है, अङ्ग को झोंक देता है-अपनी तत्परता से आप वहां प्रधान बन जाता है, और और सबको अपना अङ्ग (पिछलगू) बना लेता है। 'अक्नोपन' है (इसी से अग्नि है) यह स्थौलाष्ठीवी आचार्य मानता है। (अक्नोपन क्या ?) "न क्नोपयति = न स्नेहयति" चिकनाता नहीं = सचिक्कण नहीं करता- जहां तृण काष्ठादि में जाता है सबको रूखा बना देता है। 'त्रिभ्य आख्यातेभ्यः" तीन आख्यातों से (अग्नि) होता है,- तीन आख्यातों की क्रियाएं इसमें प्रतीत होती

हिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ७ अ० ४ पा० २ खं० हैं,–यह शाकपूणि आचार्य मानता है । [जैसे–] 'इतात्' गति अर्थ में 'इ' ( अदा० प० ) धातु से 'अक्तात्' प्रकाशन अर्थ में 'अञ्ज' ( रु० प० ) धातु से 'दग्धाद्वा' अथवा भस्मीकरण (जलाना) अर्थ में 'दह' (भ्वा०प०) धातु से 'नीतात्' प्रापण ( प्राप्त करना ) अर्थ में 'नी' ( भ्वा० उ० ) धातु से है । वह शाकपूणि 'इ, (अ०प० ) से अकार को लेता है, 'ग' कार को 'अञ्ज (रु०प०) से अथवा 'दह' (भ्वा०प०) से (लेता है) 'नी' (भ्वा०उ०) धातु पर है- तीसरे स्थान में है । "तस्य एषा०" उस अग्नि की यह ऋचा है– ॥१(१४)॥ (खं० २ ) (निरु०) "अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देव- मृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्" ॥ (ऋ०सं०१,१,१) "अग्निम्-ईले" अग्निं याचामि । 'ईलिः' अध्ये- षणाकर्मा, पूजाकर्मा वा । 'पुरोहितो' व्याख्यातः [२,३,३] 'यज्ञ'श्च [ ३, ४, २ ] 'देवो' दानाद् वा । दीपनाद् वा । द्योतनाद् वा । द्युस्थानो भवति-इति वा । योदेवः सा देवता । 'होतारं' ह्वातारम् । जुहोतेर्होता-इति-और्णवाभः । 'रत्नधातमम्' रमणीयानां धनानां दातृतमम् । तस्य एषा अपरा भवति ॥ २ (१५) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ४ पा० २ सं० अर्थ :- “अग्निमीले०” इस ऋचा का मधुच्छन्दस् ऋषि, गायत्री छन्द और आश्विन शस्त्र में विनियोग है । (अहम्) मैं ‘अग्निम्’ ‘देवम्’ अग्नि देवको ‘ईले’ ( या- चामि ) याचना करता हूं-उस से प्रार्थना करता हूं, जो 'पुरोहितम्' देवताओं का पुरोहित, “यज्ञस्य ऋत्विजम्” यज्ञ में ऋत्विज् (कर्म करने वाला), ‘होतारम्’ देवताओं का बुलाने वाला 'रत्नधातमम्' और रमणीय ( सुन्दर ) धनों का बहुत करके देने वाला है, उसको [ बुलाता हूं या याचना करता हूं ] । [ एक पद निरुक्त-] 'ईड' (अदा०आ०) धातु का सत्कार पूर्वक बरताव करना या पूजा अर्थ है । 'पुरोहित' शब्द की व्याख्या हो चुकी (२,३,३) । 'यज्ञ' शब्द की भी व्याख्या हो चुकी (३,४,२) । 'देव' क्यों ? दान करने से । अथवा दीपन ( जलाने ) से । अथवा द्योतन (प्रकाश) से । अथवा द्युस्थान है- द्युलोक में रहता है इससे [ देव है ] । “योदेवः” जो देव है, वही 'देवता' है-‘देव’ शब्द और 'देवता' शब्द दोनों समान अर्थ में हैं । 'होता' क्या होता ( बुलाने वाला ) । (हु) ( जु० प० ) धातु से 'होतृ' शब्द है, यह और्णवाभ [आचार्य मानता है] । 'रत्नधातम' रमणीय धनोंका अति दान करने वाला। “रत्नानिदधाति इति रत्नधा,” रत्नों का धारण करने

[Header] हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० ३ खं०

वाला 'रत्नधा' (सायणः) अति 'रत्नधा', 'रत्नधातम' होता है। “तस्य एषा०” उस (अग्नि) की यह और ऋचा है २ (१५)” (खं० ३) (निरु०-) “अग्निः पूर्वेभि ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत। स देवान् एह वक्षति” ॥ [ ऋ० सं० १, १, २ ]॥ अग्निर्यः पूर्वैः ऋषिभिः इडितव्यो वन्दितव्योऽ- स्माभिश्च नवतरैः । स देवान् इह आवहतु-इति ॥ स न मन्येत- अयमेव अग्निः इति। अपि एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते। ततो नु मध्यमः ॥ ३ ( १६ ) ॥ अर्थ.- “अग्निः पूर्वेभिः०” इस ऋचा का पूर्व ऋचा के समान ही ऋषि छंद और विनियोग है। ‘तद्’ (उस) शब्द की अपेक्षाबल से भाष्यकार ने ‘यद्’ (जिस या जो) शब्द का अध्याहार किया है- (यः) जो (अग्निः) अग्नि देव ‘पूर्वेभिः’ (पूर्वैः) पूर्व ‘ऋषिभिः’ ऋषियों से ‘ईड्यः’ (ईडितव्यः = वन्दितव्यः) स्तुति करने योग्य है, ‘नूतनैः’ (उत) (अस्माभिश्चनवतरैः) और हम बहुत नए ऋषियों से जो स्तुति करने योग्य है, ‘सः’ वह (अग्नि देव) ‘इह’ हमारे इस यज्ञ में ‘देवान्’ देवताओं को

हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'आ-वक्षति' (आवहतु) बुलावे या लावे । 'इति' ऐसे उदाहरण इस पार्थिव अग्नि के होंगे, यह आचार्य दिखाते हैं ॥ जिस प्रकार 'अग्नि' शब्द पार्थिव ज्योति में मिलता है उसी प्रकार मध्यम और उत्तम ज्योतियों में भी उपलब्ध होता है, इस कारण यह संकीर्ण (सांकर्ययुक्त = साधारण) शब्द है, इसीसे यहां इस विषय का विचार आरम्भ होता है- “स न मन्येत०” इत्यादि । वह (शिष्य) न मानेगा- यही (पार्थिव) अग्नि है-इस 'अग्नि' शब्द को मुख्य अर्थ यही पृथिवी का प्रसिद्ध अग्नि है, यह न मानेगा, [क्योंकि- और भी ये दूसरी ज्योतिएं = मध्यम उत्तम ज्योतिएं 'अग्नि' कहलाती हैं । “ततो नु मध्यमः” 'नु' शब्द वितर्क अर्थ में है । देखो ! तिस वक्ष्यमाण या दिखाई जाने वाली ऋचा के प्रा- माण्य से अग्नि शब्द का वाच्य मध्यम ज्योति होता है- ॥ ३ (१६) ॥ (खं० ४) (निरु०-) “अभिप्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः ॥” [ऋ० सं० ३, ८, ११, ३] अभिनमन्त समनस इव योषाः । समनं समन- नाद् वा । सम्मानाद् वा । कल्याण्यः स्मय- मानाः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'अग्निम्'–इति औपमिकम् । “घृतस्य धारा.” उदकस्य धाराः । “समिधो नसन्त” 'नसति' आप्नोतिकर्मा वा । नमतिकर्मा वा ॥ “ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः” 'हर्य्यतिः' प्रेप्साकर्मा-‘विहर्य्यति’–इति ॥ “समुद्रादूर्मिमधुमाँ उदारत्” (ऋ०सं०३,८, १०१ इति आदित्यमुक्त मन्यन्ते । “समुद्राद्धयेषोऽद्भ्य उदेति” इति च ब्राह्मणम् । अथापि ब्राह्मणं भवति—“अग्निः सर्वा देवताः” इति । तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ (१७) ॥ अर्थः-‘‘अभिप्रवन्त०” इस ऋचा का बामदेव ऋषि, सप्तम अहन् में दशरात्र के आज्य शस्त्र में विनियोग है । 'इव' (यथा) जिस प्रकार 'समनाः' (समनसः = एकस्मिन् भर्त्तरि समानमनसः) एक भर्त्ता में समान मन वालीं (स्मय- मानासः) मन्दहसन वालीं 'कल्याण्यः' रूप यौवन आदि गुणों वालीं 'योषाः' स्त्रिएं 'अभिप्रवन्त' (अभिनमन्त) संमुख भाव से नम्र होती हैं । (तथा) वैसे ही 'घृतस्य' ( उदकस्य ) 'धाराः' जलकी धाराएं 'समिधः' (समिधयन्त्यः) दीपन करती हुईं 'अग्निम्' मध्यम स्थान की ज्योति को 'नसन्त (प्राप्नु- वन्ति ) प्राप्त होती हैं, या उसको नमस्कार करती हैं । 'नस'

हिन्दी निरुक्त ( ७२ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० (भ्वा० प०) धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है, या 'नम' नमस्कार करना = झुकना) (भ्वा० प०) धातु के अर्थ- में है । 'ताः' उन जल धाराओं को जुषाणः, सेवन करता हुआ या प्यार करता हुआ 'जातवेदाः' (वैद्युतोऽग्निः) मध्यम- स्थान का वैद्युत अग्नि 'हर्यति' (विहर्य्यति) विहार करता है या कामना करता है । 'हर्य' (भ्वा० प०) धातु प्रेप्सा या अति इच्छा अर्थ में है ॥ व्याख्या “अभिप्रवन्त०” मन्त्र में घृतधारा उदक धारा ही हैं। क्योंकि एक पति के संमुख अनेक योषायों के समान मध्यम ज्योति के प्रति अनेक जलधाराओं के ही जानेका संभव है । घृत की हवनाहुतिएं अग्नि में मन्त्र के साथ एक २ करके क्रमसे दीजाती हैं, इस से घृतधाराओं के स्वीकार में उपमान उपमेय भाव नहीं बन सकता । इसीसे यहाँ अग्नि पदसे मध्यम ज्योति (वैद्युतअग्नि) ही उक्त होता है इसी सामर्थ्य को लेकर जलके नामों में “घृत” नाम पढ़ा है ॥ 'समन' कैसे ? समनन से—'सम्' (उप०) 'अन' प्राणने (अदा० प०) धातु से है। अथवा संमानन से—'सम्' (उप०) 'मन' अवबोधने (त०आ०) धातु से है ॥ 'अग्नि' शब्द से उत्तम ज्योति के ग्रहण में निगम- अर्थः- “समुद्रादूर्मिः०” अर्थात्-समुद्र या जल के समूह से ऊर्मि या अपने प्रकाश से सब जगत् को ढांपने वाला मधु- मान् (जलवाला) आदित्य 'उदारत्' नित्य २ उदय होता है।