निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 824, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५४ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० ओं को (स्निग्ध प्यारा) छन्द है) अथवा यह उष्णीषिणी (पगड़ी वाली) जैसी होती है, इससे 'उष्णिक्' है। यह औपमिक (उपमा के साथ) नाम है। 'उष्णीष' (पगड़ी) कैसे ? शुद्धि अर्थ में 'स्नै' (भ्वा० प०) धातु से है । (क्योंकि- वह शुद्ध (धोई हुई = सफेद होती है) । 'ककुप्' (छन्द) क्यों ? 'ककुभिनी इव भवति' थूही वाली जैसी होती है-पूर्वोक्त सप्ताक्षर पाद वाली उष्णिक् के मध्य में जगती छन्द का बारह (१२) अक्षरों का पाद बीच में गिरा हुआ रहता है, इससे वह बीच में मोटी हो जाने से थूही वाली जैसी प्रतीत होती है। (यह नाम भी ककुभ (थूही) की उपमा से बना है)। 'ककुभ्' और 'कुब्ज' शब्द दोनों कौटिल्य अर्थ में 'कुज' (तु० प०) धातुसे हैं। (क्योंकि-वे (थूही और कुबड़ा) टेढ़े होते हैं।) अथवा न्यग्भाव या झुकना अर्थ में 'उब्ज' (भ्वा०प०) धातु से हैं। (क्योंकि-वे झुके हुये जैसे होते हैं।) 'अनुष्टुभ्' (अनुष्टुप् छन्द) क्यों ? अनुष्टोभन (थांभने) से। (क्योंकि) गायत्री को ही त्रिपदा (तीन पाद वाली) होती हुई को चौथे पाद से थांभलेती है = ठहरालेती है- गायत्री छन्द चौबीस (२४) अक्षरों का होता है, उसमें अनुष्टुप् के आठ (८) अक्षरों के तीन ही पाद बनते हैं, उसी में आठ (८) अक्षरों का एक पाद बढ़ने से बत्तीस अक्षरों का अनुष्टुप् छन्द होता है। इस गणना से तीसरे पाद पर गायत्री छन्द गिरजाता है और अनुष्टुप् छन्द उसमें चौथा