निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५५ ) ७ अ० ३ पा० ८ खं० पाद पूरा करके मानों उसे थांभलेता है । इसी से यह अनुष्टुभ् है, यह ब्राह्मण है ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) ( निरु०- ) ' बृहती ' परिवर्हणात् । 'पङ्क्तिः' पञ्चपदा । 'त्रिष्टुप्' स्तोभत्युत्तरपदा । का तु त्रिता स्यात् ? तीर्णतमं छन्दः । त्रिवृद् वज्रः, तस्य स्तोभाति इति वा । “यत् त्रिरस्तोभत् तत् त्रिष्टुभ स्त्रिष्टु- प्वम्-” इति विज्ञायते ॥ ८ ( १२ ) ॥ अर्थः- 'बृहती' क्यों ? परिवर्हण ( वृद्धि ) से । ( क्योंकि वह अनुष्टुप् छन्द की अपेक्षा से चार अक्षरों से बढी हुई होती है । ) 'पङ्क्ति' ( छन्द ) क्यों ? ' पञ्चपदा ' । वह पांचपाद वाली होती है-क्योंकि उसके चारों पाद दश २ अक्षरों के होते हैं-कुल चालीस ( ४० ) अक्षर होते हैं, उनमें अष्टाक्षरपाद अनुष्टुप् के पांच पाद बनजाते हैं, इसी से वह पञ्चपदा हो कर ' पङ्क्ति' होगई ! 'त्रिष्टुप्' कैसे ? “ स्तोभत्युत्तरो ” इसका ' स्तुभ् ' ( स्वा० प० ) उत्तर पद है-पहिला पद ' त्रि ' और दूसरा 'स्तुभ् ' धातु । किन्तु त्रिता ( त्रित्व ) क्या । “ तीर्णतमं छन्दः ” बहुत ही प्रशंसा किया गया छन्द । क्योंकि-यह तीर्णतम = स्तुततम है और गायत्री छन्द को स्तोभन करता