भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 832, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 832

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० है। जब देवता पदार्थ का विचार करना हो, तो और देव धर्मों के साथ में इन पर भी ध्यान रखा जावे निघण्टु की रचना यास्काचार्य्य इसी उपोद्घात में समाम्नाय या निघण्टु को अपने से पूर्वस्थिति को बता कर अपने स्वीकृत या परिष्कृत निघण्टु को भी देना आवश्यक समझते हैं। जिससे यह भी सूचित हो कि उन्होंने समाम्नाय पर भाष्य लिखकर ही इस शास्त्र का उपकार नहीं किया है, बल्कि- इस के मूल शरीर को उपयुक्त और लघु भी बना दिया है। जिस के कारण अध्येताओं को इस शास्त्र का अध्ययन सुगम और अल्पकालसाध्य होगया है। भाष्यकार कहते हैं— “ अथोत अभिधानैः० तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” जहां तहां विधिवाक्यों में देवताओं के प्रधान नामोंके साथ जो विशेषण शब्द दिये हैं, उन का भी कोई आचार्य्य समाम्नान करते हैं, किन्तु वैसे शब्दों के लेने से बहुत अधिक शब्द हो जाते हैं। और भी फिर कहते हैं- “अथोत कर्मभिः०- तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” कहीं २ मन्त्रों में ऋषि कर्मों से देवता की स्तुति करता है, जैसे 'वृत्रहा' 'पुरन्दर' इत्यादि, इन शब्दोंका भी कोई आचार्य्य अपने समाम्नाय में संग्रह करते हैं, किन्तु ऐसा करने से शब्द बहुत अधिक हो जावेंगे। सुतराम् यास्क अपने निघण्टु से पहिले दो प्रकार के निघण्टुओं को देख रहे हैं, उन दोनों

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