भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 833

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ०३ पा० १० खं० में अनावश्यक शब्दों के संग्रह से बडा गौरव होंगया था अतः उन शब्दों को निकाल कर पञ्चाध्यायी के रूप में प्रधान देवता नामों और आवश्यक नैघण्टुक तथा ऐकपदिक शब्दों का उन्होंने संग्रह किया और उसी पर यह “निरुक्त” नाम भाष्य निर्माण किया है । इस स्थल के निरुक्त को देखने से यह बात स्पष्ट होजाती है कि-जिस प्रकार व्याकरण शास्त्र को अनादि परम्परागत होने पर भी उस के ग्रन्थों की रचना समय २ पर बदलती आई है, उसी प्रकार “निघण्टु” शास्त्र की भी परम्परा है इस की भी समय २ में आचार्यों के द्वारा नई ३ रचना हुई है और अब हम जिस निघण्टु को पढ रहे हैं, वह यास्क मुनिका ही किया हुआ परिष्कृत संग्रह है । जिस का प्रमाण यह प्रकरण ही है- “यत्तु संविज्ञानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत् समामने ” अर्थात्-जो संविज्ञानभूत प्राधान्य से स्तुति युक्त नाम हो उसी को मैं समाम्नान करता हूं । इस के अतिरिक्त आरम्भ की प्रतिज्ञा भी यही बात कह रही है, कि आचार्य अपने ही समाम्नान किये हुए समाम्नाय की व्याख्या करते हैं- “समाम्नायः समाम्नातः, स व्याख्यातव्यः ” अर्थात् समाम्नाय का समाम्नान हो चुका, उसकी व्याख्या करना चाहिये । यदि समाम्नाय पहिले से प्रस्तुत होता, तौ “समा- म्नायो व्याख्यातव्यः ” समाम्नाय की व्याख्या करना