निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० चाहिए, इतना ही पर्याप्त था । जैसे "अथातो धर्मजि- ज्ञासा" आदि अन्य आर्ष ग्रन्थों में प्रतिज्ञा वाक्य हैं किन्तु "समाम्नायः समाम्नातः" 'समाम्नाय का समा- म्नान किया गया'—इस अनुवाद की क्या अपेक्षा थी ? सुतराम् समाम्नाय का समाम्नान स्वयम् यास्काचार्य ने ही किया है इसी से उनको ऐसा कहना उचित था । इसी की पुष्टि "यत्त संविज्ज्ञानभूतं०" यह उपरिलिखित वाक्य स्पष्ट शब्दों में कर ही रहा है। अतः यह असन्दिग्ध सिद्ध होगया कि- यह संग्रह यास्काचार्य का ही है, और का नहीं ॥ १० ( १३ ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३ ॥ ( समाप्त उपोद्घातः )