निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ४ पा० १ ख० ही स्थान है, किन्तु अन्तरिक्ष या द्युलोक नहीं है। [ क्यों कि-उसको कर्म का अधिकार पृथिवी लोक ही में है, जो कुछ वह करता है, पृथिवी में ही करता है। ] "तं प्रथमं०" उस (अग्नि) को पहिले व्याख्यान करेंगे-क्योंकि-इस का पृथिवी स्थान है और वह हमारे निकट तथा वही लोकों की गणना में पहिले आती है, इससे प्रथम पृथिवी स्थान अग्नि की ही व्याख्या करेंगे। [ कारण के विना प्रथम का लङ्घन नहीं किया जाता। 'अग्नि' क्यों है ? वह अग्रणी होता है-सब कामों में अपने को आगे लेजाता है-वह सब जगह ऐसा उपकार करता है, जिससे अग्र (आगा) बन जावे। अथवा यज्ञों में आगे (आहवनीय आदि स्थानों में) पहुंचाया जाता है, इस से 'अग्रणी' होता हुआ 'अग्नि' हो जाता है। "अङ्गं नयति संनममानः" झुकता हुआ ही अङ्ग को लेजाता है- जिस किसी लौकिक वैदिक कर्म में जाता है, अङ्ग को झोंक देता है-अपनी तत्परता से आप वहां प्रधान बन जाता है, और और सबको अपना अङ्ग (पिछलगू) बना लेता है। 'अक्नोपन' है (इसी से अग्नि है) यह स्थौलाष्ठीवी आचार्य मानता है। (अक्नोपन क्या ?) "न क्नोपयति = न स्नेहयति" चिकनाता नहीं = सचिक्कण नहीं करता- जहां तृण काष्ठादि में जाता है सबको रूखा बना देता है। 'त्रिभ्य आख्यातेभ्यः" तीन आख्यातों से (अग्नि) होता है,- तीन आख्यातों की क्रियाएं इसमें प्रतीत होती