निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ७ अ० ४ पा० २ खं० हैं,–यह शाकपूणि आचार्य मानता है । [जैसे–] 'इतात्' गति अर्थ में 'इ' ( अदा० प० ) धातु से 'अक्तात्' प्रकाशन अर्थ में 'अञ्ज' ( रु० प० ) धातु से 'दग्धाद्वा' अथवा भस्मीकरण (जलाना) अर्थ में 'दह' (भ्वा०प०) धातु से 'नीतात्' प्रापण ( प्राप्त करना ) अर्थ में 'नी' ( भ्वा० उ० ) धातु से है । वह शाकपूणि 'इ, (अ०प० ) से अकार को लेता है, 'ग' कार को 'अञ्ज (रु०प०) से अथवा 'दह' (भ्वा०प०) से (लेता है) 'नी' (भ्वा०उ०) धातु पर है- तीसरे स्थान में है । "तस्य एषा०" उस अग्नि की यह ऋचा है– ॥१(१४)॥ (खं० २ ) (निरु०) "अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देव- मृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्" ॥ (ऋ०सं०१,१,१) "अग्निम्-ईले" अग्निं याचामि । 'ईलिः' अध्ये- षणाकर्मा, पूजाकर्मा वा । 'पुरोहितो' व्याख्यातः [२,३,३] 'यज्ञ'श्च [ ३, ४, २ ] 'देवो' दानाद् वा । दीपनाद् वा । द्योतनाद् वा । द्युस्थानो भवति-इति वा । योदेवः सा देवता । 'होतारं' ह्वातारम् । जुहोतेर्होता-इति-और्णवाभः । 'रत्नधातमम्' रमणीयानां धनानां दातृतमम् । तस्य एषा अपरा भवति ॥ २ (१५) ॥