निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ४ पा० २ सं० अर्थ :- “अग्निमीले०” इस ऋचा का मधुच्छन्दस् ऋषि, गायत्री छन्द और आश्विन शस्त्र में विनियोग है । (अहम्) मैं ‘अग्निम्’ ‘देवम्’ अग्नि देवको ‘ईले’ ( या- चामि ) याचना करता हूं-उस से प्रार्थना करता हूं, जो 'पुरोहितम्' देवताओं का पुरोहित, “यज्ञस्य ऋत्विजम्” यज्ञ में ऋत्विज् (कर्म करने वाला), ‘होतारम्’ देवताओं का बुलाने वाला 'रत्नधातमम्' और रमणीय ( सुन्दर ) धनों का बहुत करके देने वाला है, उसको [ बुलाता हूं या याचना करता हूं ] । [ एक पद निरुक्त-] 'ईड' (अदा०आ०) धातु का सत्कार पूर्वक बरताव करना या पूजा अर्थ है । 'पुरोहित' शब्द की व्याख्या हो चुकी (२,३,३) । 'यज्ञ' शब्द की भी व्याख्या हो चुकी (३,४,२) । 'देव' क्यों ? दान करने से । अथवा दीपन ( जलाने ) से । अथवा द्योतन (प्रकाश) से । अथवा द्युस्थान है- द्युलोक में रहता है इससे [ देव है ] । “योदेवः” जो देव है, वही 'देवता' है-‘देव’ शब्द और 'देवता' शब्द दोनों समान अर्थ में हैं । 'होता' क्या होता ( बुलाने वाला ) । (हु) ( जु० प० ) धातु से 'होतृ' शब्द है, यह और्णवाभ [आचार्य मानता है] । 'रत्नधातम' रमणीय धनोंका अति दान करने वाला। “रत्नानिदधाति इति रत्नधा,” रत्नों का धारण करने