निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ७ अ० ३ पा० १० खं०
भिधानस्य भवति । यथा-ब्राह्मणाय बुभुक्षिताय ओदनं देहि, स्नाताय अनुलेपनं, पिपासते पानी- यम्- इति ॥ १० ( १३ ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३॥ अर्थ:- “इति इमा०” । इस प्रकार ये देवता अनुक्रम से कहे गए-जिनमें कोई सूक्तभाक् = सूक्तों को भजने वाले-सूक्तों में जिनकी प्राधान्य से स्तुति होती है, परन्तु हविः उनको नहीं दी जाती, कोई हविर्भाक् = हविः को भजने वाले = जिनको हविः दी जाती है, या देना विहित है, “ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः” और बहुत से ऋचाओं के भजने वाले हैं-जिनकी एक २ ऋचा में (या आधी २ ऋचा में या चौथाई १ ऋचामें ) स्तुति होती है, किन्तु सूक्तों में नहीं ऐसे बहुत ही देवता हैं । ( सूक्त अनेक मन्त्रों का समूह होता है । ) । और कुछ देवता निपात के भजन करने वाले हैं-- उनकी कहीं सूक्त, मन्त्र, या आधी ऋचा में प्राधान्य से स्तुति नहीं वे सदा दूसरे प्रधान देवताओं की स्तुति में गौण रूप से आते हैं, या उनके मन्त्रों में उनके साथ स्तुति किये जाते हैं ॥ समाम्नाय के समाम्नान (संग्रह) के विषयमें “अथोत अभिधानैः” और भी अभिधानों के साथ विशेषण शब्दों को संयुक्त करके विधिशास्त्र ) हविः का विधान करता है- “इन्द्राय वृत्रघ्ने” (एकादशकपालं निर्वपेत् ) वृत्र के हनन करने वाले इन्द्र के लिये ग्यारह कपालों में पकाये हुए पुरोडाश को देवे । इन्द्राय वृत्रतुरे”