निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० 'विराट्' क्यों ? विराजन ( विशेष शोभन ) होने से, अथवा विराधन ( विकल ) होने से । अथवा विपापणा (बढने- से) । सम्पूर्ण अक्षर वाली होने से विराजमान है । अल्प अक्षर वाली होनेसे विकल है । अधिकाक्षर होने से विप्लुता उछली हुई जैसी । 'पिपीलिकमध्या' यह नाम उपमांसे है। पिपीलिका (चींटी) के समान आकार वाली होती है । 'पिपीलिका' कैसे ? गति अर्थ में पेल, ( भ्वा. प० ( धातुसे है । [क्योंकि- वह चलती ही रहती है ।]॥ ९ ॥ (खं० १०) (निरु०-) इति- इमा देवता अनुक्रान्ताः- सूक्तभाजः, हविर्भाजः, ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः। का- श्चिन्निपातभाजः । अथोत अभिधानैः संयुज्य हविश्चो दयति-इन्द्राय वृत्रघ्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे-इति । तान्यपि एके समामनन्ति । भूयांसि तु समा- म्नानात् । यत्तु संविज्जानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत् समामने । अथोत कर्मभिर्ऋषिर्देवताः स्तौति-वृत्रहा, पुरन्दर इति, तान्यपि एके समामनन्ति । भूयां सि तु समाम्नानात् । व्यञ्जनमात्रं तु तत् तस्या-