भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 840

हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'आ-वक्षति' (आवहतु) बुलावे या लावे । 'इति' ऐसे उदाहरण इस पार्थिव अग्नि के होंगे, यह आचार्य दिखाते हैं ॥ जिस प्रकार 'अग्नि' शब्द पार्थिव ज्योति में मिलता है उसी प्रकार मध्यम और उत्तम ज्योतियों में भी उपलब्ध होता है, इस कारण यह संकीर्ण (सांकर्ययुक्त = साधारण) शब्द है, इसीसे यहां इस विषय का विचार आरम्भ होता है- “स न मन्येत०” इत्यादि । वह (शिष्य) न मानेगा- यही (पार्थिव) अग्नि है-इस 'अग्नि' शब्द को मुख्य अर्थ यही पृथिवी का प्रसिद्ध अग्नि है, यह न मानेगा, [क्योंकि- और भी ये दूसरी ज्योतिएं = मध्यम उत्तम ज्योतिएं 'अग्नि' कहलाती हैं । “ततो नु मध्यमः” 'नु' शब्द वितर्क अर्थ में है । देखो ! तिस वक्ष्यमाण या दिखाई जाने वाली ऋचा के प्रा- माण्य से अग्नि शब्द का वाच्य मध्यम ज्योति होता है- ॥ ३ (१६) ॥ (खं० ४) (निरु०-) “अभिप्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः ॥” [ऋ० सं० ३, ८, ११, ३] अभिनमन्त समनस इव योषाः । समनं समन- नाद् वा । सम्मानाद् वा । कल्याण्यः स्मय- मानाः ।