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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'आ-वक्षति' (आवहतु) बुलावे या लावे । 'इति' ऐसे उदाहरण इस पार्थिव अग्नि के होंगे, यह आचार्य दिखाते हैं ॥ जिस प्रकार 'अग्नि' शब्द पार्थिव ज्योति में मिलता है उसी प्रकार मध्यम और उत्तम ज्योतियों में भी उपलब्ध होता है, इस कारण यह संकीर्ण (सांकर्ययुक्त = साधारण) शब्द है, इसीसे यहां इस विषय का विचार आरम्भ होता है- “स न मन्येत०” इत्यादि । वह (शिष्य) न मानेगा- यही (पार्थिव) अग्नि है-इस 'अग्नि' शब्द को मुख्य अर्थ यही पृथिवी का प्रसिद्ध अग्नि है, यह न मानेगा, [क्योंकि- और भी ये दूसरी ज्योतिएं = मध्यम उत्तम ज्योतिएं 'अग्नि' कहलाती हैं । “ततो नु मध्यमः” 'नु' शब्द वितर्क अर्थ में है । देखो ! तिस वक्ष्यमाण या दिखाई जाने वाली ऋचा के प्रा- माण्य से अग्नि शब्द का वाच्य मध्यम ज्योति होता है- ॥ ३ (१६) ॥ (खं० ४) (निरु०-) “अभिप्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः ॥” [ऋ० सं० ३, ८, ११, ३] अभिनमन्त समनस इव योषाः । समनं समन- नाद् वा । सम्मानाद् वा । कल्याण्यः स्मय- मानाः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'अग्निम्'–इति औपमिकम् । “घृतस्य धारा.” उदकस्य धाराः । “समिधो नसन्त” 'नसति' आप्नोतिकर्मा वा । नमतिकर्मा वा ॥ “ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः” 'हर्य्यतिः' प्रेप्साकर्मा-‘विहर्य्यति’–इति ॥ “समुद्रादूर्मिमधुमाँ उदारत्” (ऋ०सं०३,८, १०१ इति आदित्यमुक्त मन्यन्ते । “समुद्राद्धयेषोऽद्भ्य उदेति” इति च ब्राह्मणम् । अथापि ब्राह्मणं भवति—“अग्निः सर्वा देवताः” इति । तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ (१७) ॥ अर्थः-‘‘अभिप्रवन्त०” इस ऋचा का बामदेव ऋषि, सप्तम अहन् में दशरात्र के आज्य शस्त्र में विनियोग है । 'इव' (यथा) जिस प्रकार 'समनाः' (समनसः = एकस्मिन् भर्त्तरि समानमनसः) एक भर्त्ता में समान मन वालीं (स्मय- मानासः) मन्दहसन वालीं 'कल्याण्यः' रूप यौवन आदि गुणों वालीं 'योषाः' स्त्रिएं 'अभिप्रवन्त' (अभिनमन्त) संमुख भाव से नम्र होती हैं । (तथा) वैसे ही 'घृतस्य' ( उदकस्य ) 'धाराः' जलकी धाराएं 'समिधः' (समिधयन्त्यः) दीपन करती हुईं 'अग्निम्' मध्यम स्थान की ज्योति को 'नसन्त (प्राप्नु- वन्ति ) प्राप्त होती हैं, या उसको नमस्कार करती हैं । 'नस'

हिन्दी निरुक्त ( ७२ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० (भ्वा० प०) धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है, या 'नम' नमस्कार करना = झुकना) (भ्वा० प०) धातु के अर्थ- में है । 'ताः' उन जल धाराओं को जुषाणः, सेवन करता हुआ या प्यार करता हुआ 'जातवेदाः' (वैद्युतोऽग्निः) मध्यम- स्थान का वैद्युत अग्नि 'हर्यति' (विहर्य्यति) विहार करता है या कामना करता है । 'हर्य' (भ्वा० प०) धातु प्रेप्सा या अति इच्छा अर्थ में है ॥ व्याख्या “अभिप्रवन्त०” मन्त्र में घृतधारा उदक धारा ही हैं। क्योंकि एक पति के संमुख अनेक योषायों के समान मध्यम ज्योति के प्रति अनेक जलधाराओं के ही जानेका संभव है । घृत की हवनाहुतिएं अग्नि में मन्त्र के साथ एक २ करके क्रमसे दीजाती हैं, इस से घृतधाराओं के स्वीकार में उपमान उपमेय भाव नहीं बन सकता । इसीसे यहाँ अग्नि पदसे मध्यम ज्योति (वैद्युतअग्नि) ही उक्त होता है इसी सामर्थ्य को लेकर जलके नामों में “घृत” नाम पढ़ा है ॥ 'समन' कैसे ? समनन से—'सम्' (उप०) 'अन' प्राणने (अदा० प०) धातु से है। अथवा संमानन से—'सम्' (उप०) 'मन' अवबोधने (त०आ०) धातु से है ॥ 'अग्नि' शब्द से उत्तम ज्योति के ग्रहण में निगम- अर्थः- “समुद्रादूर्मिः०” अर्थात्-समुद्र या जल के समूह से ऊर्मि या अपने प्रकाश से सब जगत् को ढांपने वाला मधु- मान् (जलवाला) आदित्य 'उदारत्' नित्य २ उदय होता है।

हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० [ यद्यपि इस मन्त्र में 'अग्नि' शब्द नहीं, तथापि कोई शा- खावालों के सूक्त में “इमं स्तनम्०” इस ऋचा में “अपा प्रपीनमग्ने०” यह 'अग्नि' शब्द है, इस से यह निगम साधु है । ] यहां आदित्य को उक्त (कहा गया) मानते हैं ॥ “समुद्राद्ध्येषोदूह्यतः” यह आदित्य अग्नि समुद्र के जलों से उदय होता है । यह ब्राह्मण है । [ समुद्र से पार्थिव अग्नि के उदय होने का संभव नहीं इसी से यहां अग्नि आ- दित्य ही है । ] “अथापि०” और भी ब्राह्मण है— “अग्निः सर्वा देवताः” अर्थात्-अग्नि सब देवता हैं ॥ “तस्य०” उस ( ब्राह्मण वाक्य ) के अगली ऋचा बहुत निर्वचन के लिये है-उसका अर्थ अगली ऋचा में स्पष्टरूप से वर्णन किया हुआ है ॥ ४ ( १७ ) ॥ ( खं० ५ ) (निरु०) “इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः ससुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वद- न्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥” [ऋ०सं०२·३,२२,६] इममेव अग्निं महान्तम् आत्मानम् एकम् आ- त्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति—इन्द्रं मित्रं वरुणम् अग्निं दिव्यं च गरुत्मन्तम् । ‘दिव्यः’ दिविजः । ‘गरुत्मान्’ गरणवान् । गुर्वात्मा । महात्मा-इतिवा।

हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव सोऽग्निः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ॥ ५ (१८) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥७,४॥ अर्थ :- “इन्द्रं मित्रम्०” इस ऋचा का अस्यवाम ऋषि है । ( इममेव ) 'अग्निम्' इसी अग्नि को 'इन्द्रम्' इन्द्र 'मित्रम्' मित्र 'वरुणम्' वरुण 'आहुः' कहते हैं- [ तत्वविद् पुरुष ]-इन्द्र, मित्र और वरुण आदि नामों से इस अग्नि को ही कहते हैं-उन नामों से अग्नि के अतिरिक्त कोई दूसरा अर्थ नही है । 'अथो' ( अपि च ) और भी ( यः अयम् ) जो यह 'दिव्यः' ( दिविजः ) द्युलोक में होने वाला = रहने वाला 'सुपर्णः' (सुपतनः) सुन्दर पतन ( गमन ) करने वाला 'गरुत्मान्' (गरणवान्) स्तुतिओं वाला अथवा रसों को नि- गलने वाला ( गुर्वात्मा = महात्मा ) अथवा गुरु आत्मा वाला या महान् आत्मा आदित्य है यह भी 'सः वह अग्नि ही है । [ बहुत क्या ? ] ( इममेव अग्नि महान्तम् आत्मानम् ) इसी महान् अग्नि आत्मा को 'एकम्' 'सत्' ( आत्मानम् ) एक होते हुये आत्मा को 'विप्राः' (मेधाविनः) अभेद भाव से देखते हुए मेधावी ब्राह्मण 'बहुधा' बहुत प्रकार से 'वदन्ति कहते हैं-'अग्निम्' अग्नि, 'यमम्' यम, 'मातरिश्वानम्' मात- रिश्र्वा, (वायु) 'आहुः' कहते हैं मेधावी ब्राह्मण इसी अग्नि महान् आत्मा को एक होते हुये को भी इन्द्र, मित्र, वरुण, आदित्य, यम, और मातरिश्वा कहते है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ७ अ० ४ पा० ५ ख० “यस्तु०” किन्तु जो सूक्त को भजता है-सूक्तों में जिस की प्राधान्य से स्तुति होती है और जिसके लिये हविः का निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव अग्नि है, और ये दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योति इस अग्नि नाम से निपात को ही भजते हैं-उन में यह (अग्नि) नाम गौण रूपसे ही आता है ॥ ५ (१८) ॥ व्याख्या अष्टधा व्याख्या । (१) अभिधान (देवता का नाम) । (२) अभिधेय (उस नामका मुख्य या प्रसिद्ध अर्थ) । (३) अभिधानव्युत्पत्ति (उसी नाम की व्युत्पत्ति) । (४) प्राधा- न्यस्तुति का उदाहरण (उस नाम से उस देवता की ऋचा) (५) तन्निर्वचन (उस ऋचा की व्याख्या) । (६) विचार (प्रश्नोत्तर) । (७) उपपत्ति (युक्ति) । (८) अवधारणा (एक पक्ष की स्थिति) । ‘अग्नि’ शब्द में अष्टधा व्याख्या का प्रदर्शन (१) ‘अग्नि’ यह अभिधान । (२) यह पार्थिव अग्नि मुख्य अर्थ । (३) “अग्रणीर्भवति” यह ‘अग्नि’ नाम की व्युत्पत्ति । (४) “अग्निमीळे०” यह ऋचा उदाहरण । (५) ‘अग्निं याचामि’ यह मन्त्र की व्याख्या । (६) “स न मन्येत अयमेव अग्निः” (वह शिष्य न मानेगा यही अग्नि है) यह विचार । (७) यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते (जो सूक्त को भजता हो, जिसके लिये हविः का निर्वाप हो) यह उप- पत्ति । (८) “अयमेव अग्निः” (यही अग्नि ‘अग्नि’ शब्द का मुख्य अर्थ है) यह अवधारणा ।

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० 'अग्नि' पद के अर्थ में मतभेद । १-आत्मवित् के मत में 'अग्नि' आत्मा है । “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” [ऋ०सं० २,३,२२,६] 'एक होते हुए आत्म वस्तु को मेधावी ब्राह्मण बहुत प्रकार से कहते हैं' यह मन्त्र दर्शन उनके मत में प्रमाण है । २-याज्ञिकों के मत में-जिसका कोई स्थान विशेष माना हुआ नहीं, जिनका 'अग्नि' यह नाम ही जाना हुआ है, ऐसा देवताविशेष लोक और वेद में प्रसिद्ध, कर्म का अङ्ग 'अग्नि' शब्द का अर्थ है । ३--नैरुक्त मतमें-जिसका यह पृथिवी लोक स्थान नियत है, जिस का हविर्वहन आदि विशेष कर्म नियत है, जो मध्यम उत्तम ज्योतियों से अन्य है, ऐसा यह पार्थिव अग्नि 'अग्नि' शब्द का अर्थ है ॥ नैरुक्त मत से प्रकरण का आरम्भ । क्योंकि नैरुक्त आचार्य तीन ही देवता मानते हैं इससे आचार्य अपने मत के अनुसार ही इस प्रकरण का आरम्भ करते हैं- “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः” अग्नि पृथिवी स्थान का है, इससे पहिले उसी को व्याख्यान करेंगे । निर्वचन का प्रयोजन । प्रायः देवताओं के जितने नाम हैं वे सब परोक्षवृत्ति हैं । मन्त्रों में जिन नामों से उनकी स्तुतियां आती है, उनमें स्तो- ता ऋषि छिपाए हुये जैसे देवतात्तत्व को देखते हैं - जैसे कूट

हिन्दी निरुक्त ( ७७ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० शब्दों में वक्ता का अभिप्राय गुप्तजैसा रहता है, और उसे उस छिपे हुये अर्थ को देखते हुये प्रीति होती है-वैसे ही देवता- ओं को अपने ऐसे कूट नामों से बहुत प्रीति है, और जो प्रत्यक्षवृत्ति शब्द हैं, उनसे वे अप्रसन्न रहते हैं, “परोक्ष- प्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” ‘परोक्षप्रिय जैसे, प्रत्यक्षस्तुति के द्वेषी देवता होते हैं’ यह श्रुति है। क्योंकि- देवतानाम सब परोक्षवृत्ति हैं, उनके निर्वचन से पुरुष को आगम प्रमाणित देवता का सारूप्य मिलता है, इसी से आचार्य “अग्निः कस्मात्” इस प्रश्न के द्वारा निर्वचन को आरम्भ करते हैं। इसी प्रकार सब देवता पदों में उपोद्- घात (प्रश्न) और उस के उत्तर की स्थापना देखना चाहिये। किन्तु आत्मवित् पक्षमें सब नाम आत्मा के लिये ही हैं इससे सब अवस्थाओं में अवस्थित आत्मा को सब नामों की व्युत्पत्ति से निर्वचन करके यथार्थ रूपसे जानकर सर्वात्मा आत्मा की सब अवस्थाओं की विभूतियों को अनुभव करता है यह सब पदों की व्युत्पत्ति का प्रयोजन है। जैसे-कि- स्मृति है- “शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।” अर्थात् शब्द ब्रह्ममें निष्णात ( पारंगत ) होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। इति ॥ “अग्निमीले” देवताकाण्ड में तीनों लोकोंके देवताओं में पहिले पृथिवी स्थान देवता हैं, और उनमें ‘अग्नि’ देवता प्रथमहै, उधर सबवेदों में प्रथम ऋग्वेद है, और ऋग्वेद में भी सबसे पहिले अग्नि देवताका

हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ७ अ० ५ पा० १ खं० ही ‘अग्निमीळे’ यह सूक्त है, यह देवता और उदाहरण दोनों की योग्यता को बोधन करने के लिये आचार्य ने “अग्नि- मीळे” यही उदाहरण दिया है, सम्पूर्ण निघण्टु और सम्पूर्ण ऋग्वेद पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि-निघण्टु की रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध ऋग्वेद से ही है ॥ विचार की आवश्यकता यद्यपि शब्द का मुख्य अर्थ एक ही होता है, तथापि गौण अर्थों की संख्या नहीं है । शब्द के गौण अर्थों को भी अल्प बुद्धि पुरुष मुख्य अर्थ मान बैठते हैं, इससे विचार की आवश्यकता हुई । और इसी से अग्नि शब्द के मुख्य और गौण अर्थों का विवेचन किया गया है ॥ ५ ( १८ ) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः॥७ ४॥ अथ पञ्चमः पादः । ( खं० १ ) (निघ०) जातवेदाः ॥ २ ॥ (निरु०) जातवेदाः कस्मात् । जातानि वेद । जातानि वा एनं विदुः । जाते जाते विद्यते इतिवा । जातवित्तो वा जातधनः । जातविद्योवा जातप्रज्ञानः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० । पा० १ खं० “यत्तज्जातः पशूनविन्दत इति तज्जातवेदसो जातवेदस्त्वम्”-इति ब्राह्मणम् । “तस्मात्सर्वा- नृतून् पशवोऽग्निमभिमर्पन्ति”-इति च । तस्य एषा भवति—॥ १ (१९) ॥ अर्थ :-‘जातवेदाः’ (२) [ नैरुक्त मत में माहाभाग्य से अथवा कर्म के भेद से यह अग्नि ही है । याजक मत में नाम के भेदसे और स्तुति के भेदसे दूसरा कोई देवता है । ] क्यों? “जातानि वेद” वह जातों ( उत्पत्ति वालों ) को जानता है संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे वह न न जानता हो,—अर्थात् सर्वज्ञ है । “जातानि वा” अथवा जात = जो हैं, वे सब इसे जानते हैं । ( इन दोनों व्युत्पत्तिओं में ‘जात’ शब्द पूर्व पद और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु उत्तर पद है । पहिली व्युत्पत्ति पे सबका ज्ञाता और दूसरी में सबका ज्ञेय है । ) “जाते जाते” अथवा जात जात में विद्यमान है, इस से ‘जातवेदस्’ है । [ इस में ‘जात’ शब्द पूर्व और सत्ताथंक ‘विद्’ (दि०आ०) धातु उत्तर पद है । ] “जातविद्यो वा०” अथवा इसको विद्या हुई हुई है इसे सब वस्तुओं का प्रज्ञान होगया है । [ इस पक्ष में ‘जात’ शब्द पूर्व और ज्ञानार्थ ‘विद्’ ( अदा० प० ) धातु से उत्तर पद है । ] “यत्तज्जान.०” जो कि- वोह उत्पन्न होता हुआ

हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ७ अ० ५ पा० ३ खं० प्रहिणुत जातवेदसं कर्मभिःअभ्रनुवानम्, अपि वा उपमार्थे स्यात्-अश्वमिव जातवेदसम्-इति । इदं नो बर्हिः आसीदतु-इति । तदेतद् एकमेव जातवेदसं गायत्रं तृचं दश- तयीषु विद्यते यत्तु किञ्चिद् आग्नेयं तद् जात- वेदसानां स्थाने युज्यते । म न मन्येत अयमेवाग्निः-इति, अपि-एते उत्तरे ज्योतिषी जातवेदसी उच्येते । ततो नु मध्यमः । “अभिप्रवन्त समनेव योषाः०” इति तत् पुर- स्ताद् व्याख्यातम् [ ७, ४, ४ ] अथामौ आदित्यः- “उदुत्यं जातवेदसम्०,. इति तद् उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः [ १२, २, ४ ] यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव सोऽग्निर्जातवेदाः, निपातमेव उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ॥ ३ ( २० ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७,५ ॥ अर्थ :-“जातवेदसे०,, । · · ( वयं ) “जातवेदसे सोमंसुनवाम” हम जातवेदस् (अग्नि) के लिये सोम का सवन करते हैं -सोम को निचो-

हिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ७ अ० ५ पा० ३ ख०


ड़ते हैं। “वेदः अरातीयतः निदहति” ज्ञानवान् ( जातवेदाः ) हमसे शत्रुता करने वालों को भस्म करता है। “सः नः दुर्गाणि पर्षदति” वह ( जातवेदाः ) हमें दुर्गम स्थानों से लंघावे “अग्निः नावा सिन्धुमिव विश्वा ( विश्वानि ) दुरिता ( दुरितानि ) अतितारयति” अग्नि देव ( हमें ) नौका से नदी के समान सब पापों से उतारे। यहां भाष्य अस्पष्ट है। भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में यह मन्त्र और इसका भाष्य दोनों नहीं हैं॥ “तस्य०” उस ( जात- वेदस् ) की यह और ऋचा है—॥२॥

( खं० ३ )

अर्थः—प्रनूनं जातवेदसम्०” इस ऋचा का श्येन अग्नि- पुत्र ऋषि। गायत्री छंदः। ( हे स्तोतारः ) यूयम् ऊच्यध्वे ) हे स्तुति करने वालो तुम से कहा जाता है-- ‘नूनम्’ निश्चयही तुम सब ‘अश्वम्’ (कर्मभिः समश्नुवानम् ) कर्मों के द्वारा सब जगत् को व्यापन करने वाले ( अपिवा उपमार्थे स्यात् ) अथवा उपमा अर्थ में हो-- अश्व- मिव अश्व के समान ‘वाजिनम्’ ( अन्नवन्तम् ) अन्नवाले ‘जातवेदसम्’ जातवेदा ( अग्नि ) को ‘प्रहिनोत’ ( प्रहिणुत) प्रेरणा करो। “इदम् नः बर्हिः आसदे” (आसीदतु) इस हमारी बिछाई हुई कुशा पर ( वह जातवेदा ) बैठे॥ ‘तदेतद्०’ सो यह एक ही जातवेदस् देवका गायत्री छन्द में तृच ( तीनऋचाओं का सूक्त) दश मण्डल के ऋग्वेद में है।

किन्तु जो कुछ मन्त्रजात अग्नि देवता का है, वह सब जातवेदस् देवके मन्त्रों के स्थानमें प्रयोग किया जाता है पढा जाता है॥ आक्षेप । “सनमन्येत०” वह (शिष्य) न मानेगा कि यही (पार्थिव) अग्नि जातवेदाः है। क्यों कि ये और भी दूसरे (मध्यम उत्तम) दोनो ज्योतिएं जातवेदस् कही जाती हैं। “ततोऽनुमध्यमः” तिस कारण पहिले “मध्यम है” इस के अनुसार ऋचा है— “अभिप्रवन्त समनेव योषाः” यह ऋचा पहिले व्याख्यान की जा चुकी है (७,४,४)। इस ऋचामें जातवेदा को जलधाराओं का सेवन करने वाला कहा गया है, और वह मध्यम ही होसकता है किन्तु यह पार्थिव अग्नि नहीं ॥ अब “वोह आदित्य है” इसके अनुसार ऋचा— “उदुत्यं जातवेदसम्० यह है। इस की व्याख्या आगे होगी [१२, २, ४] इस मन्त्र में “जातवेदसम्” यह पद “सूर्यम्” पदका विशेषण है, इससे जातवेदस् उत्तम ज्योति है; यह सिद्ध होता है ॥ उत्तर “यस्तु सूक्तं भजते०” किन्तु जो सूक्त को भजता है, और जिस के लिए हविः का निर्बाप होता है, वह यही पार्थिव अग्नि जातवेदाः है। दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योतिएं इस नामसे निपात का ही भजन करती हैं— उनका यह (जात- वेदस्) गौण नाम है, किन्तु मुख्य नहीं ॥ ३ (२०) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७, ५ ॥

हिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ७ अ० ६ पा० २ सं० षष्ठः पादः । ( खं० १ ) (निघ०-) वैश्वानरः ॥३॥ (निरु०-) ‘वैश्वानरः’ कस्मात् । विश्वान् नरान् नयति । विश्वे एनं नरा नयन्ति-इतिवा । अपि वा विश्वानर एव स्यात्-प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि, तस्य वैश्वानरः । तस्य एषा भवति ॥ १ (२१) ॥ अर्थ :- ‘वैश्वानर’ क्यों ? विश्व ( सब ) नरों को नयन करता है, इस लोक से उस लोक को लेजाता है। अथवा सब प्रवृत्तियों में यही सब नरों को प्रवृत्त करता है, (प्रयोजक कर्त्ता) अथवा विश्व (सब) नर इसे ले जाते हैं- जिन २ कर्मों में अङ्गभूत करते हैं, (कर्मकारक) अथवा ‘विश्वानर ही हो। क्या ? ‘प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि’ सब प्राणियों में अन्तर्गत। उसका वैश्वानर है-विश्वानर का अपत्य (पुत्र) वैश्वानर है। “तस्य०” उस वैश्वानर की यह ऋचा है- ॥१(२१)॥ ( खं० २ ) (निरु०-) “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं वि- चेष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण (ऋ०सं० १।७,६.१) इतो जातः सर्वमिदम् अभिविपश्यति, वैश्वानरः

हिन्दी निरुक्त \qquad ( ८५ ) \qquad ७ अ० ६ पा० २ खं० संयतते सूर्येण, राजा यः सर्वेषां भूतानाम् अभि- श्रयणीयः, तस्य वयं कल्याण्या मतौ स्याम-इति । तत् को वैश्वानरः ? 'मध्यमः'-इति आचार्याः। वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति ॥ २(२२) ॥ अर्थ :-“वैश्वानरस्य०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि, पृष्ठ्य और अभिप्लव अहनों में आग्निमारुत की प्रतिपत् है । 'इतः' (पृथिवीलोकात् ) इस पृथिवी लोक से-औषधि वनस्पतियों से 'जातः' उत्पन्न हुआ हुआ 'इदम्' इस 'विश्वम्' ( सर्वम् ) सबको 'विचष्टे' ( अभिविपश्यति ) अच्छी तरह देखता है, अथवा प्रकाशक होने से दिखाता है । ( यश्च ) 'वैश्वानरः' और जो वैश्वानर 'सूर्येण' सूर्य के साथ 'यतते' ( संयतते ) अपने प्रकाश के द्वारा मिलता है । ( यश्च ) और जो 'भुवनानां' लोकों का 'राजा' राजा 'अभिश्रीः' ( अभि- श्रयणीयः ) और आश्रयणीय है, ( तस्य ) 'वैश्वानरस्य' उस वैश्वानर की 'सुमतौ' ( कल्याण्यां मतौ ) शुभ मति में 'स्याम' हम होवें-हम ऐसा शुभ आचरण करें कि-उस निखिल भुवन पतिकी हमारे ऊपर शुभ मति बनी रहे (यह प्रार्थना है)। “तत्को वैश्वानरः” सो कौन वैश्वानर है ? 'मध्यम' ज्योति वैश्वानर है, यह कोई नैरुक्त आचार्य मानते हैं । क्योंकि-वर्ष ( वृष्टि ) कर्म से ऋषि इसकी स्तुति करता है ॥ २ ( २२ ) ॥ व्याख्या प्रथम पाद् की पीछे व्याख्या । क्योंकि- लोक में भी

हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं० पहिले स्तुति की जाती है और पीछे मांगा जाता है, इससे यही न्याय वेद में भी लेना चाहिये, यह दिखाने के लिये पहिले पाद् की व्याख्या अन्य पादों की व्याख्या के पीछे की है। पहिले पाद् में प्रार्थना और अन्य पादों में देवता की स्तुति है ॥ २ ( २२ ) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०) “प्रनू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वान् अधूनोत् काष्ठा अवशम्बरं भेत् ॥” [ऋ० सं० १,४, २५,६] ॥ प्रब्रवीमि तन्महित्वं माहाभाग्यं वृषभस्य वर्षितुः अपां, यं पूरवः पूरयितव्याः मनुष्या वृत्रहणं मेघ- हनं सचन्ते सेवन्ते वर्षकामाः । ‘दस्युः’ दस्यतेः क्षयार्थात् । उपदस्यन्ति अस्मिन् रसाः। उपदासयति कर्माणि, तम्-अग्निर्वैश्वानरः घ्नन् अवाधूनोत् अपः काष्ठाः, अभिनत् शम्बरं मेघम् ।' अथासौ आदित्यः-इति पूर्वे याज्ञिकाः ॥३॥ अर्थ :-“प्रनू महित्वं वृषभस्य०” इस ऋचा का नोधास ऋषि, त्रिष्टुप् छंदः, वैश्वानर अग्नि देवता । ( अहम् ) मैं ( तस्य ) उस 'वृषभस्य' वर्षितुः ( अपाम् ) जलके बरसाने वाले मेघके ( तत् ) महित्वं ( माहाभाग्यम् )

हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ७ अ० ६। पा० ४ खं० ( उस ) महिमाको ‘प्रवोचम्’ ( प्रब्रवीमि ) बखानताहूं, ‘यम्’ जिस ‘वृत्रहत्याय’ ( मेघहनम् ) मेघके हनन करने वाले को ‘पूरवः’ [ पूरयितव्या मनुष्याः ) मनुष्य ‘सचन्ते’ ( सेवन्ते ) सेवन करते हैं । “वैश्वानरः अग्निः” वैश्वानर अग्नि ने ‘दस्युम्’ रसों के नष्टकरने वाले ( अनावृष्टि के द्वारा ) ‘शम्बरम्’ ( मेघम् ) मेघको ‘जघन्वान्’ ( घ्नन् ) मारते हुये ‘भेत्’ अभिन्नत् विदारण किया और ‘काष्ठाः’ ( अपः ) ‘अवअवधूनोत्’ जलोंको कंपाया या बरसाया ॥ पूरु क्या? पूरयितव्य = पूरण करने योग्य । कौन! मनु- ष्य । दस्यु क्यों? उसके न बरसने से रस ( धान ) आदि उपदस्त = क्षीण हो जाते हैं । अथवा यह कर्मों को अनावृष्टि के द्वारा क्षीण कर देता है, इस से यह दस्यु है । अब ‘वोह आदित्य है’ ऐसा पुराने याज्ञिक मानते हैं ॥३॥ ( खं०४ ) [निरु०] एषां लोकानां रोहेण सवनानां रोह आम्नातः, रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः, ताम् अनुकृतिं होता आग्निमारुते शस्त्रेवैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यतेसोऽपि न स्तोत्रियम् आदियेत आग्नेयोहि भवति, तत आगच्छति मध्यस्थाना देवता रुद्रं च मरुतश्चततोऽग्निम् इहस्थानम् अत्रैव स्तोत्रियं शंसति ॥ ४ ॥ अर्थः- “एषां लोकानाम्०” इन लोकों के रोहण के क्रमसे सवनों का रोहण आम्नान (विधान) किया है-जो ही

हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ७ अ० ६ पा० ४ खं० लोकों के आरोहण (चढने) का क्रम है,-पृथिवी-अन्तरिक्ष- द्यौ, वही सबनों का भी क्रम है-प्रातः सवन- माध्यन्दिन सवन तृतीय सवन । (उससे क्या ?) "रोहात् प्रत्यवरोहः०" रोहणसे प्रत्यवरोहण करना ( उतरना ) इष्ट है- आरोहण के विपरीत क्रमसे उतरना भी किसी कर्म में अभीष्ट है। "ताम् अनुकृतिम्" उस अनुकृति ( नकल ) को होता (एक ऋत्विज्) आग्निनमारुत (अग्निमरुत् देवोंके ) शस्त्र में वैश्वानरीय (वैश्वानर के ) सूक्तसे आरम्भ करता है। "सोऽपि०" वह (होता) भी स्तोत्रिय ( वैश्वानरीयसूक्त) को आदर न करेगा । क्योंकि- वह ( स्तोत्रिय ) अग्निका है सिद्धान्ती के मत में वैश्वानर अग्नि ही है, और उसका सूक्त आग्नेय ही हुआ, अतः द्युलोक में पृथिवी स्थान अग्नि के सूक्त को न पढेगा । क्यों कि पढता है, इससे सिद्ध होता है कि- वैश्वानर आदित्य भी है।) आगेका क्रमभी इसी पक्ष में है- ) "तत आगच्छति०" वहांसे (द्युलोकसे ) आता है मध्यस्थान देवताओं को- रुद्र को और मरुतों को ( स्तुति करता है। "ततोऽग्निम्०" उससे (मध्य स्थानसे उतर कर) यहां के रहने वाले स्तोत्रिय = ( स्तवनीय ) अग्नि को यहीं शंसन करता है स्तुति करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या । निरुक्त शास्त्र के सिद्धान्त में "वैश्वानर" पार्थिव अग्नि ही है। उस पर "तत्को वैश्वानर." इत्यादि ग्रन्थ से विचार आरम्भ हुआ है, तहां पहिले काङ्के नैरुक्तों के मतसे

हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६, पा० ४ खं० "प्रनू 'महित्वम्' इस निगम में वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह आक्षेप किया गया है कि- "वैश्वानर" मध्यम ज्योति है। अब इस खण्डमें "वैश्वानर" आदित्य है यह पूर्व याज्ञिक- ओं के मत से उपपादन किया है। पूर्व याज्ञिक वे हैं, जिन्होंने विधि मन्त्र और अर्थवाद वेद के सब भागोंसे यज्ञ वस्तु को समीचीन रीति से समझा और उसका प्रयोग भी किया या अनुष्ठान भी किया था। वे ही ऐसा कहते हैं कि- "वैश्वानर" आदित्य है। सुतराम् इस प्रत्यय को गौण न समझना चा- हिये। वे लोग किस युक्ति से ऐसा कहते हैं, वही (विधि में अनुकरण की प्रसिद्धि) इस खण्ड में दिखाई गई है। अनुकरण। तृतीय पाद में नैरुक्तों के मत से तीन देवता- ओं के साथ सब संसार बांट दिया है। उस बटवारे में पृथिवी अन्तरिक्ष और द्युलोक भी बट गये हैं। वैसे ही पृथिवी के साथ प्रातःसवन (कर्म) अन्तरिक्ष के साथ माध्यन्दिन सवन और द्युलोक के साथ तृतीय सवन विभक्त किया गया है। किसी कर्म में लोकों का आरोहण या चढ़ना और प्रत्य- वरोहण या उतरना विधान किया है। किन्तु उसका साक्षात् अनुष्ठान करना असंभव है। अतः पूर्वोक्त सवनों के अनुष्ठान द्वारा आरोहण प्रत्यवरोहणों का अनुकरण किया जाता है। इस अनुकरण को होता करता है जिसका यह प्रकार है- होता पृथिवी लोक में स्थित है, अतः पहिले वह पृथिवी के भाग प्रातःसवन के शस्त्र (मन्त्र) को पढता है। उसको पढता हुआ वह पृथिवी पर आरूढ होता है। फिर वह माध्यन्दिन सवन जो अन्तरिक्ष लोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है। क्योंकि उसी का क्रम है। उस शस्त्र को पढता हुआ वह

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ६ पा० ५ खं अन्तरिक्ष में आरूढ होता है। फिर तीसरा सवन जो द्युलोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है, और उसको पढता हुआ तीसरे लोक में आरूढ होता है। वही होता जो द्युलोक में आरूढ है, यज्ञायज्ञिय अग्निष्टोम साम में जो आग्निमारुत शस्त्र है, उसको उन सवनों के लोकों के प्रत्यवरोहण को करता हुआ वैश्वानर के सूक्त से आरम्भ करता है। अर्थात्-अब होता द्युलोक में है, वहा प्रत्यवरोहण का आरम्भ करता है, वह प्रत्यवरोहण आरोहण के उलटे क्रम से होगा, अतः उसे वह सूक्त पढना चाहिये, जो उस लोक के देवता (आदित्य) का हो। उसके अर्थ यह वैश्वानर के "वैश्वानराय पृथु पाजसे०" (ऋ० स० ३,१,३,) सूक्त को पढ़ता है। यदि "वैश्वानर" आदित्य न होता, तो उसके सूक्त को आदित्य लोक में क्यों पढ़ता, तथा ऐसा न करने से प्रत्यवरोहण का अनुकरण भी कैसे हो सकता है। अतः "वैश्वानर" आदि- त्य ही है, यह पूर्व याज्ञिकों का अभिप्राय है। उसी क्रम की पुष्टि के लिये अन्तरिक्ष और पृथिवी लोक के प्रत्यवरो- हण में उस उस के देवतोग्र्यो के शस्त्र पाठ के अनुष्ठान को दिखाता है। शेष सुगम है ॥४॥ (खं० ५) (निरु०-) अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति। एतस्य हि द्वादशविधं कर्म। अथापि ब्राह्मणं भवति-“असौ वा आदित्योऽ- ग्रिर्वैश्वानरः-इति।