निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 858, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६, पा० ४ खं० "प्रनू 'महित्वम्' इस निगम में वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह आक्षेप किया गया है कि- "वैश्वानर" मध्यम ज्योति है। अब इस खण्डमें "वैश्वानर" आदित्य है यह पूर्व याज्ञिक- ओं के मत से उपपादन किया है। पूर्व याज्ञिक वे हैं, जिन्होंने विधि मन्त्र और अर्थवाद वेद के सब भागोंसे यज्ञ वस्तु को समीचीन रीति से समझा और उसका प्रयोग भी किया या अनुष्ठान भी किया था। वे ही ऐसा कहते हैं कि- "वैश्वानर" आदित्य है। सुतराम् इस प्रत्यय को गौण न समझना चा- हिये। वे लोग किस युक्ति से ऐसा कहते हैं, वही (विधि में अनुकरण की प्रसिद्धि) इस खण्ड में दिखाई गई है। अनुकरण। तृतीय पाद में नैरुक्तों के मत से तीन देवता- ओं के साथ सब संसार बांट दिया है। उस बटवारे में पृथिवी अन्तरिक्ष और द्युलोक भी बट गये हैं। वैसे ही पृथिवी के साथ प्रातःसवन (कर्म) अन्तरिक्ष के साथ माध्यन्दिन सवन और द्युलोक के साथ तृतीय सवन विभक्त किया गया है। किसी कर्म में लोकों का आरोहण या चढ़ना और प्रत्य- वरोहण या उतरना विधान किया है। किन्तु उसका साक्षात् अनुष्ठान करना असंभव है। अतः पूर्वोक्त सवनों के अनुष्ठान द्वारा आरोहण प्रत्यवरोहणों का अनुकरण किया जाता है। इस अनुकरण को होता करता है जिसका यह प्रकार है- होता पृथिवी लोक में स्थित है, अतः पहिले वह पृथिवी के भाग प्रातःसवन के शस्त्र (मन्त्र) को पढता है। उसको पढता हुआ वह पृथिवी पर आरूढ होता है। फिर वह माध्यन्दिन सवन जो अन्तरिक्ष लोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है। क्योंकि उसी का क्रम है। उस शस्त्र को पढता हुआ वह