निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ६ पा० ५ खं अन्तरिक्ष में आरूढ होता है। फिर तीसरा सवन जो द्युलोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है, और उसको पढता हुआ तीसरे लोक में आरूढ होता है। वही होता जो द्युलोक में आरूढ है, यज्ञायज्ञिय अग्निष्टोम साम में जो आग्निमारुत शस्त्र है, उसको उन सवनों के लोकों के प्रत्यवरोहण को करता हुआ वैश्वानर के सूक्त से आरम्भ करता है। अर्थात्-अब होता द्युलोक में है, वहा प्रत्यवरोहण का आरम्भ करता है, वह प्रत्यवरोहण आरोहण के उलटे क्रम से होगा, अतः उसे वह सूक्त पढना चाहिये, जो उस लोक के देवता (आदित्य) का हो। उसके अर्थ यह वैश्वानर के "वैश्वानराय पृथु पाजसे०" (ऋ० स० ३,१,३,) सूक्त को पढ़ता है। यदि "वैश्वानर" आदित्य न होता, तो उसके सूक्त को आदित्य लोक में क्यों पढ़ता, तथा ऐसा न करने से प्रत्यवरोहण का अनुकरण भी कैसे हो सकता है। अतः "वैश्वानर" आदि- त्य ही है, यह पूर्व याज्ञिकों का अभिप्राय है। उसी क्रम की पुष्टि के लिये अन्तरिक्ष और पृथिवी लोक के प्रत्यवरो- हण में उस उस के देवतोग्र्यो के शस्त्र पाठ के अनुष्ठान को दिखाता है। शेष सुगम है ॥४॥ (खं० ५) (निरु०-) अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति। एतस्य हि द्वादशविधं कर्म। अथापि ब्राह्मणं भवति-“असौ वा आदित्योऽ- ग्रिर्वैश्वानरः-इति।