निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 860, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ६ पा० ५ ख० अथापि निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति-“आयो- द्यां भात्या पृथिवीम्”-इति। एष हि द्यावापृथिव्यौ आभासयति । अथापि छान्दोमिकं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति, “दिवि पृष्ठो अरोचत”-इति अथापि हविष्यन्तीयं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति ॥ ५ ॥ अर्थ :- “अथापि वैश्वान०” और वैश्वानर का द्वादश कपाल ( बारह कपालों पर बनाया हुआ पुरोडाश ) होता है। क्योंकि-इस (आदित्य) का बारह ( १२ ) मासों का विभाग करना कर्म है । और भी- ब्राह्मण है-वोह आदित्य अग्नि वैश्वानर है। और भी- सूर्य वैश्वानर की निविद् [ किसी आहुति का शस्त्र के मध्य में गिरने वाला मन्त्र ] है- 'जो द्युलोक को और पृथिवी लोक को प्रकाशित करता है । क्योंकि-यही (आ- दित्य) द्युलोक और पृथिवी लोक को भासन करता है। और भी छान्दोमिक सूक्त सूर्य वैश्वानर का है।-'द्युलोक में लगा हुआ प्रकाशता है। और भी हविष्यन्तीय सूक्त सूर्य वैश्वानर का है-॥५॥ व्याख्या जिस प्रकार “वैश्वानर” के आदित्य होने में वैश्वा- नरीय सूक्त से प्रत्यवरोहण विधि का अनुकरण प्रमाण है उसी