भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 861

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं० प्रकार वैश्वानर के द्वादश कपाल पुरोडाश की विधि का अनुकरण भी प्रमाण है । क्योंकि देवताओं के गुणों की समा- नता को लेकर ही यज्ञ में गुणों की विधि कल्पित होती हैं इष्ट देवता में जैसे गुण होते हैं, उसके यज्ञ में वैसे ही गुणों की विधिएं की जाती हैं । जिससे कि वैश्वानर आदित्य है और आदित्य चैत्र आदि बारह मासों का विभाग करता है अथवा चैत्र आदि बारह मासों में भिन्न २ स्वरूपों से बारह प्रकार का होता है, इसी से उसका पुरोडाश बारह कपालों पर संस्कार किया जाता है = पकाया जाता है । सुतराम् वैश्वानर के लिये द्वादशकपाल की विधि का अनुकरण उसके आदित्य होने को सिद्ध करता है । ब्राह्मण निविद् और सूक्त अपने शब्दों में ही "वैश्वानर" को आदित्य कह रहे हैं॥६॥ ( खं० ६ ) [निरु०-] अयमेव अग्निर्वैश्वानरः-इति शाक- पूणिः । विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिषी, वैश्वानरो ऽयम् । यत् ताभ्यां जायते । कथं नु अयम्-एताभ्यां जायते, इति ? यत्र वैद्युतः शरणम् अभिहन्ति, यावद् अनुपात्तो भवति मध्यमधर्मैस्तावद् भवति- उदकेन्धनः शरीरोपशमनः, उपादीयमान एव अयं सम्पद्यते उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः ॥६॥ अर्थ.- "अयमेव०" यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर