भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 862

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं० है,—यह शाकपूणि आचार्य मानता है । 'विश्वानर' ये दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योति हैं, और 'वैश्वानर' यह पार्थिव अग्नि है । क्योंकि उन (ज्योतियों) से उत्पन्न होता है ! कैसे यह (पार्थिव अग्नि) उन (विद्युत् और आदित्य) से उत्पन्न होता है ? जहां वैद्युत (बिजली की) अग्नि किसी आश्रय (काष्ठ या जल) में आती है, जब तक मनुष्यों से ग्रहण नहीं की जाती है, मध्यमधर्मा ही रहती है-उस में विद्युत् का स्वभाव ही रहता है । [स्वभाव कौनसा ?] जल से जलना और पार्थिव वस्तु तृण काष्ठ आदि से बुझना । जैसे ही मनुष्य उसे लेलेते हैं, उदक (जल) से बुझने और कठोर (काष्ठ आदि) से जलने लगती है ॥ ६ ॥ व्याख्या अब भाष्यकार कुछ नैरूक्तों और पूर्व याज्ञिकों के उन मतों को खण्डन करते हैं, जिनमें "वैश्वानर" विद्युत् अथवा आदित्य ठहरता है । इसके लिये आप अपने सहमत शाक- पूणि आचार्य के मतको उद्धृत करते हैं, जिस में कि-पहिले "वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में छः प्रमाण दिये हुये हैं और फिर उक्त दोनों विपक्षों के सब हेतुओं का खण्डन भले प्रकार से किया है । तथा और २ भी आवश्यक प्रमाण दिये हैं । भाष्यकार शाकपूणि के मत को इस विषय में बड़ा युक्तिसम्पन्न और पर्याप्त समझते हैं, इस लिये उसके मतके दिखा देने के साथ ही इस विषय और अध्याय को समाप्त कर देंगे । शाकपूणि का मत और स्वपक्ष मण्डन ।