भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 863

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं० शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि- "वैश्वानर" शब्द ही इस बात में साक्ष्य देता है कि-यह पार्थिव अग्नि ही वैश्वा- नर है । क्योंकि-'विश्वानर' नाम और 'अण्' तद्धित (प्रत्यय) के योग से 'वैश्वानर' शब्द बनता है । 'विश्वानर' नाम विद्युत् तथा आदित्य का है उनका पुत्र होने से पार्थिव अग्नि 'वैश्वानर' कहलाता है । व्याकरण की रीति से यह अर्थ युक्तिसंगत है । विद्युत् का अपत्य पार्थिव अग्नि । विद्युत् (बिजली) अन्तरिक्ष लोक का तेज है । जब वह ओषधि वनस्पतियों पर गिर जाता है, तो उसी का पार्थिव अग्नि बन जाता है। जब तक वह आकाश में रहता है, पानी से जलता है और काष्ठ आदि पार्थिव कठोर वस्तु- से बुझता है, और जब पृथिवी में आकर पार्थिव अग्नि बन जाता है, तब पानी से बुझने लगता है और काष्ठ से जलने लगता है । इससे ये दोनों आपस में भिन्न २ हैं और पिता पुत्र हैं ॥६॥ ( खं० ७ ) (निरु०-) अथ आदित्यात्। उदीचि मथसमा- वृत्ते आदित्ये कंसं वा मणिं वा परिमृज्य प्रति- स्वरे यत्र शुष्कगोमयम् असंस्पर्शयन् धारयति तत् प्रदीध्यते, सोऽयमेव सम्पद्यते । अथाऽपि आह-"वैश्वानरो यतते सूर्येण-" इति । नच पुनः आत्मना आत्मा संयतते, अन्ये- नैव अन्यः संयतते ।