निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं० इतः इमम् आदधाति । अमुतः अमुष्य रश्मयः प्रादुर्भवन्ति, इतः अस्य अर्चिषः, तयोर्भासोः संसङ्गं दृष्ट्वा एवम्-अव- क्ष्यत् ॥ ७ ॥ अर्थ :- “अथ आदित्यात्” अब आदित्य से (पार्थिव अग्नि का जन्म कहते हैं-) । उत्तर दिशा में 'पहिले पहिल आए हुये आदित्य में (आदित्य के साम्हने) कंस (कांसी) को और मणि (तैजस = आतिशी कांच आदि) को साफ करके धूप में जहां सूखा गोबर हो उससे न बुझाता हुआ (जैसे कि-उस पर उसकी छाया पड़े) आदमी धारण करता है, तो वह जलने लगता है-उस कांसी या कांच के द्वारा सूर्य से उस गोबर में तेज उतर आता है, यह यही (पार्थिव अग्नि) बन जाता है। और भी मन्त्रद्रष्टा = ऋषि कहता है- “वैश्वानरो०” वैश्वानर सूर्य के साथ मिलता है। और फिर अपने से आप (कोई) मिलता नहीं, (किन्तु) दूसरे से ही दूसरा मिलता है। “इतः इमम्०” इस सूखे गोबर से उत्पन्न अग्नि को (काष्ठ आदि से) रख लेते हैं। (यह प्रकार आदित्य से पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति का है।) “अमुतः” उस (आदित्य मण्डल) से उस (आदित्य) की रश्मियें (किरणें) प्रकट होती हैं, इस (पार्थिव अग्नि) से इसकी अर्चिषं (ज्वालाएं) निकलती हैं; उन दोनों प्रकाशों का संयोग देख कर (ऋषि ने) ऐसा कहा होगा-