निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ९ खं० [ “वैश्वानरो यतते सूर्येण०” इससे “वैश्वानर” का सूर्य से पृथक् होना सिद्ध होता है। जैसी पृथक्ता दिखाई गई है, उससे वह पार्थिव अग्नि ही होता है, किन्तु मध्यम नहीं। ] ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) (निरु०-) अथ यानि एतानि औत्तमिकानि सूक्तानि भागानि वा, सावित्राणि वा सौर्याणि वा, पौष्णानि वा, वैष्णवानि वा, वैश्वदेवानि वा, तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्, आदित्य- कर्मणा च एनम्- अस्तोष्यन्- इति-“उदेषि” इति, “अस्तमेषि” इति, विपर्य्येपि” इति । आग्नेयेष्वेव हि सूक्तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा भवन्ति, अग्निकर्मणा स्तौति-इति,-“दहसि”- इति, “वहसि” इति, “पचासि” इति । यथो एतद्-वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति-इति, अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते ॥८॥ अर्थः- “अथ०” दूसरी बात- [यदि सूर्य्य वैश्वानर होता, तो जो ये उत्तम लोक के देवता विशेषों की स्तुति के अर्थ सूक्त हैं, जैसे अथवा भग के, अथवा सविता के, अथवा सूर्य के, अथवा पूषा के, अथवा विष्णु के, अथवा विश्व देवों के, उन में वैश्वानर के प्रवाद