निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ७ अ० ६ पा० ४ खं० लोकों के आरोहण (चढने) का क्रम है,-पृथिवी-अन्तरिक्ष- द्यौ, वही सबनों का भी क्रम है-प्रातः सवन- माध्यन्दिन सवन तृतीय सवन । (उससे क्या ?) "रोहात् प्रत्यवरोहः०" रोहणसे प्रत्यवरोहण करना ( उतरना ) इष्ट है- आरोहण के विपरीत क्रमसे उतरना भी किसी कर्म में अभीष्ट है। "ताम् अनुकृतिम्" उस अनुकृति ( नकल ) को होता (एक ऋत्विज्) आग्निनमारुत (अग्निमरुत् देवोंके ) शस्त्र में वैश्वानरीय (वैश्वानर के ) सूक्तसे आरम्भ करता है। "सोऽपि०" वह (होता) भी स्तोत्रिय ( वैश्वानरीयसूक्त) को आदर न करेगा । क्योंकि- वह ( स्तोत्रिय ) अग्निका है सिद्धान्ती के मत में वैश्वानर अग्नि ही है, और उसका सूक्त आग्नेय ही हुआ, अतः द्युलोक में पृथिवी स्थान अग्नि के सूक्त को न पढेगा । क्यों कि पढता है, इससे सिद्ध होता है कि- वैश्वानर आदित्य भी है।) आगेका क्रमभी इसी पक्ष में है- ) "तत आगच्छति०" वहांसे (द्युलोकसे ) आता है मध्यस्थान देवताओं को- रुद्र को और मरुतों को ( स्तुति करता है। "ततोऽग्निम्०" उससे (मध्य स्थानसे उतर कर) यहां के रहने वाले स्तोत्रिय = ( स्तवनीय ) अग्नि को यहीं शंसन करता है स्तुति करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या । निरुक्त शास्त्र के सिद्धान्त में "वैश्वानर" पार्थिव अग्नि ही है। उस पर "तत्को वैश्वानर." इत्यादि ग्रन्थ से विचार आरम्भ हुआ है, तहां पहिले काङ्के नैरुक्तों के मतसे