भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 856

हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ७ अ० ६। पा० ४ खं० ( उस ) महिमाको ‘प्रवोचम्’ ( प्रब्रवीमि ) बखानताहूं, ‘यम्’ जिस ‘वृत्रहत्याय’ ( मेघहनम् ) मेघके हनन करने वाले को ‘पूरवः’ [ पूरयितव्या मनुष्याः ) मनुष्य ‘सचन्ते’ ( सेवन्ते ) सेवन करते हैं । “वैश्वानरः अग्निः” वैश्वानर अग्नि ने ‘दस्युम्’ रसों के नष्टकरने वाले ( अनावृष्टि के द्वारा ) ‘शम्बरम्’ ( मेघम् ) मेघको ‘जघन्वान्’ ( घ्नन् ) मारते हुये ‘भेत्’ अभिन्नत् विदारण किया और ‘काष्ठाः’ ( अपः ) ‘अवअवधूनोत्’ जलोंको कंपाया या बरसाया ॥ पूरु क्या? पूरयितव्य = पूरण करने योग्य । कौन! मनु- ष्य । दस्यु क्यों? उसके न बरसने से रस ( धान ) आदि उपदस्त = क्षीण हो जाते हैं । अथवा यह कर्मों को अनावृष्टि के द्वारा क्षीण कर देता है, इस से यह दस्यु है । अब ‘वोह आदित्य है’ ऐसा पुराने याज्ञिक मानते हैं ॥३॥ ( खं०४ ) [निरु०] एषां लोकानां रोहेण सवनानां रोह आम्नातः, रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः, ताम् अनुकृतिं होता आग्निमारुते शस्त्रेवैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यतेसोऽपि न स्तोत्रियम् आदियेत आग्नेयोहि भवति, तत आगच्छति मध्यस्थाना देवता रुद्रं च मरुतश्चततोऽग्निम् इहस्थानम् अत्रैव स्तोत्रियं शंसति ॥ ४ ॥ अर्थः- “एषां लोकानाम्०” इन लोकों के रोहण के क्रमसे सवनों का रोहण आम्नान (विधान) किया है-जो ही