भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 845

हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ७ अ० ४ पा० ५ ख० “यस्तु०” किन्तु जो सूक्त को भजता है-सूक्तों में जिस की प्राधान्य से स्तुति होती है और जिसके लिये हविः का निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव अग्नि है, और ये दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योति इस अग्नि नाम से निपात को ही भजते हैं-उन में यह (अग्नि) नाम गौण रूपसे ही आता है ॥ ५ (१८) ॥ व्याख्या अष्टधा व्याख्या । (१) अभिधान (देवता का नाम) । (२) अभिधेय (उस नामका मुख्य या प्रसिद्ध अर्थ) । (३) अभिधानव्युत्पत्ति (उसी नाम की व्युत्पत्ति) । (४) प्राधा- न्यस्तुति का उदाहरण (उस नाम से उस देवता की ऋचा) (५) तन्निर्वचन (उस ऋचा की व्याख्या) । (६) विचार (प्रश्नोत्तर) । (७) उपपत्ति (युक्ति) । (८) अवधारणा (एक पक्ष की स्थिति) । ‘अग्नि’ शब्द में अष्टधा व्याख्या का प्रदर्शन (१) ‘अग्नि’ यह अभिधान । (२) यह पार्थिव अग्नि मुख्य अर्थ । (३) “अग्रणीर्भवति” यह ‘अग्नि’ नाम की व्युत्पत्ति । (४) “अग्निमीळे०” यह ऋचा उदाहरण । (५) ‘अग्निं याचामि’ यह मन्त्र की व्याख्या । (६) “स न मन्येत अयमेव अग्निः” (वह शिष्य न मानेगा यही अग्नि है) यह विचार । (७) यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते (जो सूक्त को भजता हो, जिसके लिये हविः का निर्वाप हो) यह उप- पत्ति । (८) “अयमेव अग्निः” (यही अग्नि ‘अग्नि’ शब्द का मुख्य अर्थ है) यह अवधारणा ।