निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० 'अग्नि' पद के अर्थ में मतभेद । १-आत्मवित् के मत में 'अग्नि' आत्मा है । “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” [ऋ०सं० २,३,२२,६] 'एक होते हुए आत्म वस्तु को मेधावी ब्राह्मण बहुत प्रकार से कहते हैं' यह मन्त्र दर्शन उनके मत में प्रमाण है । २-याज्ञिकों के मत में-जिसका कोई स्थान विशेष माना हुआ नहीं, जिनका 'अग्नि' यह नाम ही जाना हुआ है, ऐसा देवताविशेष लोक और वेद में प्रसिद्ध, कर्म का अङ्ग 'अग्नि' शब्द का अर्थ है । ३--नैरुक्त मतमें-जिसका यह पृथिवी लोक स्थान नियत है, जिस का हविर्वहन आदि विशेष कर्म नियत है, जो मध्यम उत्तम ज्योतियों से अन्य है, ऐसा यह पार्थिव अग्नि 'अग्नि' शब्द का अर्थ है ॥ नैरुक्त मत से प्रकरण का आरम्भ । क्योंकि नैरुक्त आचार्य तीन ही देवता मानते हैं इससे आचार्य अपने मत के अनुसार ही इस प्रकरण का आरम्भ करते हैं- “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः” अग्नि पृथिवी स्थान का है, इससे पहिले उसी को व्याख्यान करेंगे । निर्वचन का प्रयोजन । प्रायः देवताओं के जितने नाम हैं वे सब परोक्षवृत्ति हैं । मन्त्रों में जिन नामों से उनकी स्तुतियां आती है, उनमें स्तो- ता ऋषि छिपाए हुये जैसे देवतात्तत्व को देखते हैं - जैसे कूट