भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 847

हिन्दी निरुक्त ( ७७ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० शब्दों में वक्ता का अभिप्राय गुप्तजैसा रहता है, और उसे उस छिपे हुये अर्थ को देखते हुये प्रीति होती है-वैसे ही देवता- ओं को अपने ऐसे कूट नामों से बहुत प्रीति है, और जो प्रत्यक्षवृत्ति शब्द हैं, उनसे वे अप्रसन्न रहते हैं, “परोक्ष- प्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः” ‘परोक्षप्रिय जैसे, प्रत्यक्षस्तुति के द्वेषी देवता होते हैं’ यह श्रुति है। क्योंकि- देवतानाम सब परोक्षवृत्ति हैं, उनके निर्वचन से पुरुष को आगम प्रमाणित देवता का सारूप्य मिलता है, इसी से आचार्य “अग्निः कस्मात्” इस प्रश्न के द्वारा निर्वचन को आरम्भ करते हैं। इसी प्रकार सब देवता पदों में उपोद्- घात (प्रश्न) और उस के उत्तर की स्थापना देखना चाहिये। किन्तु आत्मवित् पक्षमें सब नाम आत्मा के लिये ही हैं इससे सब अवस्थाओं में अवस्थित आत्मा को सब नामों की व्युत्पत्ति से निर्वचन करके यथार्थ रूपसे जानकर सर्वात्मा आत्मा की सब अवस्थाओं की विभूतियों को अनुभव करता है यह सब पदों की व्युत्पत्ति का प्रयोजन है। जैसे-कि- स्मृति है- “शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।” अर्थात् शब्द ब्रह्ममें निष्णात ( पारंगत ) होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। इति ॥ “अग्निमीले” देवताकाण्ड में तीनों लोकोंके देवताओं में पहिले पृथिवी स्थान देवता हैं, और उनमें ‘अग्नि’ देवता प्रथमहै, उधर सबवेदों में प्रथम ऋग्वेद है, और ऋग्वेद में भी सबसे पहिले अग्नि देवताका