भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 848

हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ७ अ० ५ पा० १ खं० ही ‘अग्निमीळे’ यह सूक्त है, यह देवता और उदाहरण दोनों की योग्यता को बोधन करने के लिये आचार्य ने “अग्नि- मीळे” यही उदाहरण दिया है, सम्पूर्ण निघण्टु और सम्पूर्ण ऋग्वेद पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि-निघण्टु की रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध ऋग्वेद से ही है ॥ विचार की आवश्यकता यद्यपि शब्द का मुख्य अर्थ एक ही होता है, तथापि गौण अर्थों की संख्या नहीं है । शब्द के गौण अर्थों को भी अल्प बुद्धि पुरुष मुख्य अर्थ मान बैठते हैं, इससे विचार की आवश्यकता हुई । और इसी से अग्नि शब्द के मुख्य और गौण अर्थों का विवेचन किया गया है ॥ ५ ( १८ ) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः॥७ ४॥ अथ पञ्चमः पादः । ( खं० १ ) (निघ०) जातवेदाः ॥ २ ॥ (निरु०) जातवेदाः कस्मात् । जातानि वेद । जातानि वा एनं विदुः । जाते जाते विद्यते इतिवा । जातवित्तो वा जातधनः । जातविद्योवा जातप्रज्ञानः ।