निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 844, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव सोऽग्निः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ॥ ५ (१८) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥७,४॥ अर्थ :- “इन्द्रं मित्रम्०” इस ऋचा का अस्यवाम ऋषि है । ( इममेव ) 'अग्निम्' इसी अग्नि को 'इन्द्रम्' इन्द्र 'मित्रम्' मित्र 'वरुणम्' वरुण 'आहुः' कहते हैं- [ तत्वविद् पुरुष ]-इन्द्र, मित्र और वरुण आदि नामों से इस अग्नि को ही कहते हैं-उन नामों से अग्नि के अतिरिक्त कोई दूसरा अर्थ नही है । 'अथो' ( अपि च ) और भी ( यः अयम् ) जो यह 'दिव्यः' ( दिविजः ) द्युलोक में होने वाला = रहने वाला 'सुपर्णः' (सुपतनः) सुन्दर पतन ( गमन ) करने वाला 'गरुत्मान्' (गरणवान्) स्तुतिओं वाला अथवा रसों को नि- गलने वाला ( गुर्वात्मा = महात्मा ) अथवा गुरु आत्मा वाला या महान् आत्मा आदित्य है यह भी 'सः वह अग्नि ही है । [ बहुत क्या ? ] ( इममेव अग्नि महान्तम् आत्मानम् ) इसी महान् अग्नि आत्मा को 'एकम्' 'सत्' ( आत्मानम् ) एक होते हुये आत्मा को 'विप्राः' (मेधाविनः) अभेद भाव से देखते हुए मेधावी ब्राह्मण 'बहुधा' बहुत प्रकार से 'वदन्ति कहते हैं-'अग्निम्' अग्नि, 'यमम्' यम, 'मातरिश्वानम्' मात- रिश्र्वा, (वायु) 'आहुः' कहते हैं मेधावी ब्राह्मण इसी अग्नि महान् आत्मा को एक होते हुये को भी इन्द्र, मित्र, वरुण, आदित्य, यम, और मातरिश्वा कहते है ॥