भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 843, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 843

हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं० [ यद्यपि इस मन्त्र में 'अग्नि' शब्द नहीं, तथापि कोई शा- खावालों के सूक्त में “इमं स्तनम्०” इस ऋचा में “अपा प्रपीनमग्ने०” यह 'अग्नि' शब्द है, इस से यह निगम साधु है । ] यहां आदित्य को उक्त (कहा गया) मानते हैं ॥ “समुद्राद्ध्येषोदूह्यतः” यह आदित्य अग्नि समुद्र के जलों से उदय होता है । यह ब्राह्मण है । [ समुद्र से पार्थिव अग्नि के उदय होने का संभव नहीं इसी से यहां अग्नि आ- दित्य ही है । ] “अथापि०” और भी ब्राह्मण है— “अग्निः सर्वा देवताः” अर्थात्-अग्नि सब देवता हैं ॥ “तस्य०” उस ( ब्राह्मण वाक्य ) के अगली ऋचा बहुत निर्वचन के लिये है-उसका अर्थ अगली ऋचा में स्पष्टरूप से वर्णन किया हुआ है ॥ ४ ( १७ ) ॥ ( खं० ५ ) (निरु०) “इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः ससुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वद- न्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥” [ऋ०सं०२·३,२२,६] इममेव अग्निं महान्तम् आत्मानम् एकम् आ- त्मानं बहुधा मेधाविनो वदन्ति—इन्द्रं मित्रं वरुणम् अग्निं दिव्यं च गरुत्मन्तम् । ‘दिव्यः’ दिविजः । ‘गरुत्मान्’ गरणवान् । गुर्वात्मा । महात्मा-इतिवा।

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