भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 841

हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ७ अ० ४ पा० ४ खं० 'अग्निम्'–इति औपमिकम् । “घृतस्य धारा.” उदकस्य धाराः । “समिधो नसन्त” 'नसति' आप्नोतिकर्मा वा । नमतिकर्मा वा ॥ “ता जुषाणो हर्य्यति जातवेदाः” 'हर्य्यतिः' प्रेप्साकर्मा-‘विहर्य्यति’–इति ॥ “समुद्रादूर्मिमधुमाँ उदारत्” (ऋ०सं०३,८, १०१ इति आदित्यमुक्त मन्यन्ते । “समुद्राद्धयेषोऽद्भ्य उदेति” इति च ब्राह्मणम् । अथापि ब्राह्मणं भवति—“अग्निः सर्वा देवताः” इति । तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ (१७) ॥ अर्थः-‘‘अभिप्रवन्त०” इस ऋचा का बामदेव ऋषि, सप्तम अहन् में दशरात्र के आज्य शस्त्र में विनियोग है । 'इव' (यथा) जिस प्रकार 'समनाः' (समनसः = एकस्मिन् भर्त्तरि समानमनसः) एक भर्त्ता में समान मन वालीं (स्मय- मानासः) मन्दहसन वालीं 'कल्याण्यः' रूप यौवन आदि गुणों वालीं 'योषाः' स्त्रिएं 'अभिप्रवन्त' (अभिनमन्त) संमुख भाव से नम्र होती हैं । (तथा) वैसे ही 'घृतस्य' ( उदकस्य ) 'धाराः' जलकी धाराएं 'समिधः' (समिधयन्त्यः) दीपन करती हुईं 'अग्निम्' मध्यम स्थान की ज्योति को 'नसन्त (प्राप्नु- वन्ति ) प्राप्त होती हैं, या उसको नमस्कार करती हैं । 'नस'