निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु जो कुछ मन्त्रजात अग्नि देवता का है, वह सब जातवेदस् देवके मन्त्रों के स्थानमें प्रयोग किया जाता है पढा जाता है॥ आक्षेप । “सनमन्येत०” वह (शिष्य) न मानेगा कि यही (पार्थिव) अग्नि जातवेदाः है। क्यों कि ये और भी दूसरे (मध्यम उत्तम) दोनो ज्योतिएं जातवेदस् कही जाती हैं। “ततोऽनुमध्यमः” तिस कारण पहिले “मध्यम है” इस के अनुसार ऋचा है— “अभिप्रवन्त समनेव योषाः” यह ऋचा पहिले व्याख्यान की जा चुकी है (७,४,४)। इस ऋचामें जातवेदा को जलधाराओं का सेवन करने वाला कहा गया है, और वह मध्यम ही होसकता है किन्तु यह पार्थिव अग्नि नहीं ॥ अब “वोह आदित्य है” इसके अनुसार ऋचा— “उदुत्यं जातवेदसम्० यह है। इस की व्याख्या आगे होगी [१२, २, ४] इस मन्त्र में “जातवेदसम्” यह पद “सूर्यम्” पदका विशेषण है, इससे जातवेदस् उत्तम ज्योति है; यह सिद्ध होता है ॥ उत्तर “यस्तु सूक्तं भजते०” किन्तु जो सूक्त को भजता है, और जिस के लिए हविः का निर्बाप होता है, वह यही पार्थिव अग्नि जातवेदाः है। दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योतिएं इस नामसे निपात का ही भजन करती हैं— उनका यह (जात- वेदस्) गौण नाम है, किन्तु मुख्य नहीं ॥ ३ (२०) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते सप्तमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ ७, ५ ॥