भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 853

हिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ७ अ० ६ पा० २ सं० षष्ठः पादः । ( खं० १ ) (निघ०-) वैश्वानरः ॥३॥ (निरु०-) ‘वैश्वानरः’ कस्मात् । विश्वान् नरान् नयति । विश्वे एनं नरा नयन्ति-इतिवा । अपि वा विश्वानर एव स्यात्-प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि, तस्य वैश्वानरः । तस्य एषा भवति ॥ १ (२१) ॥ अर्थ :- ‘वैश्वानर’ क्यों ? विश्व ( सब ) नरों को नयन करता है, इस लोक से उस लोक को लेजाता है। अथवा सब प्रवृत्तियों में यही सब नरों को प्रवृत्त करता है, (प्रयोजक कर्त्ता) अथवा विश्व (सब) नर इसे ले जाते हैं- जिन २ कर्मों में अङ्गभूत करते हैं, (कर्मकारक) अथवा ‘विश्वानर ही हो। क्या ? ‘प्रत्यृतः सर्वाणि भूतानि’ सब प्राणियों में अन्तर्गत। उसका वैश्वानर है-विश्वानर का अपत्य (पुत्र) वैश्वानर है। “तस्य०” उस वैश्वानर की यह ऋचा है- ॥१(२१)॥ ( खं० २ ) (निरु०-) “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं वि- चेष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण (ऋ०सं० १।७,६.१) इतो जातः सर्वमिदम् अभिविपश्यति, वैश्वानरः