निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त \qquad ( ८५ ) \qquad ७ अ० ६ पा० २ खं० संयतते सूर्येण, राजा यः सर्वेषां भूतानाम् अभि- श्रयणीयः, तस्य वयं कल्याण्या मतौ स्याम-इति । तत् को वैश्वानरः ? 'मध्यमः'-इति आचार्याः। वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति ॥ २(२२) ॥ अर्थ :-“वैश्वानरस्य०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि, पृष्ठ्य और अभिप्लव अहनों में आग्निमारुत की प्रतिपत् है । 'इतः' (पृथिवीलोकात् ) इस पृथिवी लोक से-औषधि वनस्पतियों से 'जातः' उत्पन्न हुआ हुआ 'इदम्' इस 'विश्वम्' ( सर्वम् ) सबको 'विचष्टे' ( अभिविपश्यति ) अच्छी तरह देखता है, अथवा प्रकाशक होने से दिखाता है । ( यश्च ) 'वैश्वानरः' और जो वैश्वानर 'सूर्येण' सूर्य के साथ 'यतते' ( संयतते ) अपने प्रकाश के द्वारा मिलता है । ( यश्च ) और जो 'भुवनानां' लोकों का 'राजा' राजा 'अभिश्रीः' ( अभि- श्रयणीयः ) और आश्रयणीय है, ( तस्य ) 'वैश्वानरस्य' उस वैश्वानर की 'सुमतौ' ( कल्याण्यां मतौ ) शुभ मति में 'स्याम' हम होवें-हम ऐसा शुभ आचरण करें कि-उस निखिल भुवन पतिकी हमारे ऊपर शुभ मति बनी रहे (यह प्रार्थना है)। “तत्को वैश्वानरः” सो कौन वैश्वानर है ? 'मध्यम' ज्योति वैश्वानर है, यह कोई नैरुक्त आचार्य मानते हैं । क्योंकि-वर्ष ( वृष्टि ) कर्म से ऋषि इसकी स्तुति करता है ॥ २ ( २२ ) ॥ व्याख्या प्रथम पाद् की पीछे व्याख्या । क्योंकि- लोक में भी